जबलपुर। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को केवल युद्ध करना नहीं सिखाया, बल्कि जीवन को जीतने का मार्ग दिखाया है। अर्जुन की समस्या केवल कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े होने की नहीं थी, बल्कि उसके भीतर भी एक कुरुक्षेत्र चल रहा था। यह कुरुक्षेत्र मोह और विवेक, कर्तव्य और भावुकता तथा मन और बुद्धि के बीच का संघर्ष था। यह उद्गार परमहंस स्वामी गिरिशानन्द सरस्वती जी महाराज ने साकेतधाम, गौरीघाट में आयोजित श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय ‘सांख्य योग’ पर प्रवचन के चतुर्थ दिवस व्यक्त किए। प्रवचन सत्र शाम 5:30 बजे से 6:30 बजे तक आयोजित हुआ।
महाराज जी ने कहा कि केवल यह सोच लेना कि ‘मैं बहुत समझदार हूं और अपने मन को नियंत्रित कर लूंगा’, पर्याप्त नहीं है। इन्द्रियां अत्यंत शक्तिशाली होती हैं। आंख कहती है यह देखो, कान कहते हैं यह सुनो, जीभ कहती है यह खाओ और मन कहता है कि यह मुझे चाहिए। धीरे-धीरे मनुष्य अपनी बुद्धि को पीछे छोड़कर इन्द्रियों के पीछे चलने लगता है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन इसका बड़ा उदाहरण है। व्यक्ति सोचता है कि वह केवल पांच मिनट मोबाइल देखेगा, लेकिन देखते ही देखते पांच मिनट पचास मिनट में बदल जाते हैं और इसका पता भी नहीं चलता। इसलिए गीता हमें इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने की शिक्षा देती है। यदि इन्द्रियों को खुला छोड़ दिया जाए तो वे मनुष्य के मन को अपने साथ बहा ले जाती हैं।
महाराज जी ने कहा कि जिस मन को भगवान की प्राप्ति हो जाती है, उसे संसार की छोटी-छोटी वस्तुएं अधिक आकर्षित नहीं कर पातीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे किसी बच्चे के हाथ में मिट्टी का खिलौना हो और अचानक उसके हाथ में सोना आ जाए तो वह मिट्टी के खिलौने को छोड़ देगा। उसी प्रकार जब मनुष्य को ईश्वरानंद का अनुभव होने लगता है तो सांसारिक विषयों का आकर्षण स्वतः कम होने लगता है।
प्रवचन के दौरान महाराज श्री का पूजन ब्रजेन्द्र उपाध्याय, रेखा चुडासमा, वंदना मनोज लोहिया, राजेश पटेल, मनीष गुप्ता, रामकुमार पटेल, प्रमिला अग्रवाल, प्रणव पाठक, यश व्यास, अमन दुबे, दिलीप चतुर्वेदी, एसके चौरसिया, उमेश पिल्ले, अटल बिहारी, पंकज अग्रवाल, अलभ्य बाजपेयी, भानु नवेरिया, बालकृष्ण अग्रवाल, नलिन पांडेय, रमेश नवेरिया, उमेश नवेरिया, राजेश सोनी और मनीष दुबे सहित अन्य श्रद्धालुओं ने किया। पूजन की विधि पंडित रोहित दुबे एवं पंडित सौरभ दुबे ने संपन्न कराई।


