नई दिल्ली, हर साल 15 अगस्त आते ही देश तिरंगे के रंग में रंग जाता है। स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और घरों से लेकर देश के प्रमुख स्मारकों तक स्वतंत्रता दिवस की रौनक दिखाई देती है। इस पूरे राष्ट्रीय उत्सव का सबसे प्रमुख दृश्य नई दिल्ली के लाल किले से सामने आता है, जहां प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं। सवाल यह है कि आखिर आजादी के इस सबसे बड़े राष्ट्रीय समारोह के लिए लाल किले को ही क्यों चुना गया? इसका जवाब भारत के लंबे इतिहास, सत्ता के प्रतीक के रूप में लाल किले की भूमिका और आजादी के आंदोलन से जुड़ी इसकी विरासत में छिपा है।लाल किले का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी नई राजधानी शाहजहानाबाद के केंद्र में कराया था। इसका निर्माण 1639 में शुरू हुआ और 1648 में पूरा हुआ। यमुना के किनारे बना यह विशाल किला मुगल सत्ता का प्रमुख केंद्र रहा। इसकी लाल बलुआ पत्थर की विशाल दीवारों ने इसे न सिर्फ स्थापत्य की दृष्टि से विशिष्ट बनाया, बल्कि इसे दिल्ली में सत्ता और शासन के सबसे बड़े प्रतीकों में भी शामिल कर दिया। यूनेस्को के अनुसार, लाल किला शाहजहां के दौर से ही सत्ता का प्रतीक रहा और बाद में ब्रिटिश शासन तथा भारत की स्वतंत्रता से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का भी साक्षी बना।
लाल किले का महत्व केवल मुगल काल तक सीमित नहीं रहा। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को विद्रोह का प्रतीकात्मक नेतृत्व सौंपा गया। विद्रोह के दमन के बाद अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर लिया और लाल किले पर भी ब्रिटिश सैन्य कब्जे का दौर शुरू हुआ। 1857 के बाद किले के कई हिस्सों में बदलाव किए गए और कुछ ऐतिहासिक संरचनाओं को नुकसान भी पहुंचा।जब भारत आजाद हुआ तो देश को ऐसे प्रतीक की जरूरत थी, जो सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय स्वाभिमान का भी प्रतिनिधित्व करे। लाल किला इस भूमिका के लिए स्वाभाविक रूप से सामने आया। यह वही स्थान था जो सदियों तक दिल्ली की राजनीतिक सत्ता का केंद्र रहा था और जिसने मुगल शासन से लेकर ब्रिटिश दौर तक सत्ता के बदलाव देखे थे।
यही वजह है कि आजादी के बाद लाल किले को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय समारोह से जोड़ने का निर्णय धीरे-धीरे एक मजबूत परंपरा में बदल गया। खास बात यह है कि लाल किले से स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने की परंपरा की शुरुआत 15 अगस्त 1947 को नहीं, बल्कि 16 अगस्त 1947 को हुई थी। भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो के अनुसार, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 16 अगस्त 1947 को पहली बार लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।इस तथ्य से यह भी स्पष्ट होता है कि आज 15 अगस्त को लाल किले से होने वाला समारोह केवल उसी दिन की पहली ध्वजारोहण घटना को दोहराने की परंपरा नहीं है, बल्कि आजादी की उस ऐतिहासिक विरासत का विस्तार है, जो स्वतंत्र भारत के शुरुआती दिनों में लाल किले से जुड़ गई।
लाल किले को चुनने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण उसका ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक महत्व है। जिस इमारत को कभी शासकों की शक्ति और साम्राज्य का प्रतीक माना जाता था, उसी की प्राचीर से स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री तिरंगा फहराता है। यह बदलाव अपने आप में बेहद शक्तिशाली संदेश देता है- सत्ता अब किसी साम्राज्य की नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की जनता और उसके लोकतांत्रिक गणराज्य की है।लाल किले की पहचान दिल्ली और भारत के राजनीतिक इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई है। यूनेस्को भी इसे भारत की स्वतंत्रता के पहले समारोह के स्थल के रूप में दर्ज करता है और बताता है कि आज भी यहीं स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है।15 अगस्त की सुबह प्रधानमंत्री द्वारा तिरंगा फहराने के बाद राष्ट्रगान और औपचारिक सलामी होती है। इसके बाद प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते हैं। इस संबोधन में सरकार की उपलब्धियों, चुनौतियों, नीतियों और आने वाले वर्षों की दिशा का उल्लेख किया जाता है।


