नई दिल्ली, बिहार के एक छोटे से गांव में, पथरीली पहाड़ियों और एकांत के विशाल विस्तार से घिरे इलाके में एक ऐसा व्यक्ति रहता था, जिसने यह मानने से इनकार कर दिया कि भूगोल ही मानव भाग्य का निर्धारण करे। उनका नाम दशरथ मांझी था, जिनका कबीर की तरफ पोथी से कभी वास्ता नहीं पड़ा था और न सहायता के लिए कोई संस्थागत जुड़ाव था। फिर भी अपने जीवन के अंत तक उन्होंने एक असाधारण उपलब्धि हासिल कर ली थी। उन्होंने अकेले ही एक पहाड़ को काटकर सड़क बनाई थी। उनकी कहानी सिर्फ दृढ़ता की कहानी नहीं है। यह प्रेम, दुख और इस अटूट विश्वास से बुनी हुई कहानी है कि एक दृढ़ निश्चयी व्यक्ति भी अनेकों का भाग्य बदल सकता है।
बिहार के गया जिले का वह ऐतिहासिक गांव गहलौर, जहां ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी रहते थे। 14 जनवरी 1934 को जन्मे मांझी ने एक असंभव को संभव कर दिखाया। परिवार की एक सदस्य ने एक इंटरव्यू में कहा था, “मेरे दादाजी ने प्यार की खातिर छेनी-हथौड़ी से पहाड़ तोड़ दिया।”गांव एक पथरीली पहाड़ी के पीछे बसा हुआ था, जो लोगों को न सिर्फ बाजार और रोजगार, बल्कि पानी के लिए भी आसपास के क्षेत्रों से अलग करती थी। बुनियादी जरूरतों के लिए ग्रामीणों को पहाड़ी के चारों ओर लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी।
कहा जाता है कि उनकी पत्नी पहाड़ी के पास दुर्गम इलाके को पार करते समय गंभीर रूप से घायल हो गईं। दशरथ की पत्नी को पानी लानी के लिए रोज पहाड़ पार करना होता था। तीन किलोमीटर की यह यात्रा दुखदाई थी। एक सुबह उनकी पत्नी पानी के लिए घर से निकली, लेकिन वापसी में सिर पर घड़ा न देखकर मांझी घबरा चुके थे। पूछने पर पता चला कि पहाड़ पार करते हुए समय पत्नी का पैर फिसल गया था। उन्हें चोट तो आई ही, पानी भरा मटका भी गिरकर टूट गया।बस उसी दिन दशरथ मांझी ने पहाड़ के सीने को चीर रास्ता बनाने की ‘पर्वत प्रतिज्ञा’ ले ली। 1960 का दौर था, दशरथ मांझी ने सिर्फ एक हथौड़ा और छेनी लेकर पहाड़ को काटना शुरू किया। उनके पास न मशीनें थीं, न इंजीनियर, न ही धन, बस दृढ़ संकल्प था। एक आदमी का ठोस चट्टान में रास्ता बनाना हास्यास्पद लगता था। शुरू में लोग उनका मजाक उड़ाते थे। कई ग्रामीणों का मानना था कि वह पागल हो गया है। फिर भी, उपहास ने उसे हतोत्साहित नहीं किया। वह दिन-रात काम करते रहे।
इतने लंबे समय तक अपने प्रयास को जारी रखने के लिए उन्होंने दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया, जिसमें उन्हें शारीरिक रूप से कठिन काम कम मजदूरी पर करने पड़ते थे। इन कामों से जो भी थोड़ी-बहुत कमाई होती थी, उसे वे बड़ी सावधानी से रखते थे और उससे अपने काम के लिए जरूरी औजार खरीदते थे।एक समय ऐसा भी आया जब उनकी बचत पर्याप्त नहीं थी, तो उन्होंने अपनी बकरियां तक बेच दीं ताकि वे बेहतर और अधिक भरोसेमंद उपकरण खरीद सकें। पहाड़ पर उनका काम बेहद कठिन, शारीरिक रूप से थकाने वाला और असहनीय रूप से धीमा था। हथौड़े की हर एक चोट से चट्टान का सिर्फ एक छोटा सा टुकड़ा टूटता था, जिससे शुरुआत में प्रगति लगभग न के बराबर होती थी। फिर भी, जैसे-जैसे दिन, महीने और साल बीतते गए, ये छोटे-छोटे प्रयास जुड़ते गए और धीरे-धीरे उस असंभव से दिखने वाले पहाड़ को रूपांतरित कर दिया। 1960 से 1982 तक, 22 लंबे साल में मांझी ने अथक परिश्रम किया और पहाड़ को थोड़ा-थोड़ा करके तराशा।
धीरे-धीरे असंभव साकार होने लगा। दशरथ मांझी ने जब अपना काम पूरा किया, तब तक उन्होंने पहाड़ को काटकर लगभग 110 मीटर लंबी, लगभग 9 मीटर चौड़ी सड़क हाथों से तराश दी थी। इस बदलाव ने पूरे क्षेत्र का जीवन बदल दिया। गया जिले के अत्री और वजीरगंज क्षेत्रों के बीच की दूरी काफी कम हो गई। जिस रास्ते से होकर पहले लंबा और खतरनाक चक्कर लगाना पड़ता था, अब वह सीधा और बहुत छोटा रास्ता बन गया।धीरे-धीरे लेकिन सार्थक रूप से उन्हें पहचान मिली। बिहार सरकार ने उनके योगदान को सम्मानित किया और उनकी कहानी दृढ़ता और संकल्प के प्रतीक के रूप में पूरे देश में लोगों को प्रेरित करने लगी।17 अगस्त 2007 को दिल्ली के एम्स में पित्ताशय के कैंसर के इलाज के दौरान दशरथ मांझी का निधन हो गया। वे 73 वर्ष के थे और उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।
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