स्थगन आदेश के बावजूद निर्माण पर उठे सवाल, राजस्व अमले से पंचायत और पुलिस तक की भूमिका पर सवालिया निशान_अनूपपुर* ग्राम पंचायत लामाटोला का मंगल भवन निर्माण प्रकरण अब जिला प्रशासन के उच्च स्तर तक पहुंच गया है।भूमि विवाद को लेकर लगातार की जा रही शिकायतों और उठ रहे सवालों के बीच कलेक्टर द्वारा पुनः जांच दल गठित कर मामले की जांच एवं निराकरण के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई है। प्रशासन के इस कदम के बाद अब निगाहें गठित जांच दल की कार्यवाही पर टिक गई हैं।
मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि शिकायतकर्ता का कहना है कि निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही संबंधित भूमि के दस्तावेज और विवाद की स्थिति जिम्मेदार अधिकारियों के संज्ञान में लाई गई थी। इसके बावजूद निर्माण प्रक्रिया आगे बढ़ती रही। शिकायतकर्ता के अनुसार उक्त भूमि को लेकर तहसीलदार द्वारा पूर्व में स्थगन आदेश भी जारी किया जा चुका था।
*_स्थगन आदेश था तो निर्माण कैसे बढ़ता गया?_*
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि भूमि विवादित थी और उस पर स्थगन आदेश मौजूद था, तो मौके पर निर्माण कार्य को रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?यदि राजस्व अमला विवाद की जानकारी से पहले ही अवगत था,तो फिर निर्माण एजेंसी और ग्राम पंचायत को स्पष्ट निर्देश देकर कार्य रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी? इन सवालों का जवाब अब पुनः गठित जांच दल की जांच में सामने आने की उम्मीद है।
*_बार-बार जांच और नापजोख, फिर भी तस्वीर साफ नहीं_*
प्रकरण में राजस्व अधिकारियों द्वारा मौके पर जांच एवं नापजोख किए जाने की बात सामने आई है।इसके बावजूद विवाद समाप्त होने के बजाय लगातार बना हुआ है।यही बात अब जांच का महत्वपूर्ण बिंदु बनती दिखाई दे रही है कि जब एक ही जमीन की कई बार नापजोख की गई, तो हर बार स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं हो सकी?
क्या पूर्व में की गई जांच में कोई कमी रह गई थी या फिर राजस्व रिकॉर्ड और मौके की स्थिति के बीच कोई अंतर था? इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक मानी जा रही है।
*_जिम्मेदारी किसकी? अधिकारी एक-दूसरे की ओर क्यों देख रहे?_*
शिकायतकर्ता का आरोप है कि मामले को उच्च स्तर तक ले जाने पर संबंधित निरीक्षणकर्ता द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर होने की बात कहते हुए जिम्मेदारी दूसरे राजस्व अधिकारी के ऊपर डाल दी गई।यदि ऐसा हुआ है तो सवाल यह भी है कि शिकायतकर्ता आखिर किस अधिकारी के पास जाए? क्या किसी विवादित निर्माण को समय रहते रोकना किसी एक अधिकारी की जिम्मेदारी है या फिर संबंधित विभागों की संयुक्त जिम्मेदारी?
अब यह भी जांच का विषय है कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित अधिकारियों ने किस स्तर पर क्या कार्रवाई की।
*_पुलिस की भूमिका पर भी उठे सवाल_*
स्थगन आदेश और निर्माण को लेकर शिकायतकर्ता द्वारा पुलिस से संपर्क किए जाने की बात भी सामने आई है। शिकायतकर्ता का कहना है कि थाना प्रभारी से फोन पर संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन फोन नहीं उठाया गया। बाद में संपर्क होने के बावजूद स्पष्ट जवाब नहीं मिलने का आरोप भी लगाया गया है।
मामले की प्रारंभिक जांच किस अधिकारी अथवा बीट प्रभारी के स्तर पर हुई, इसे लेकर भी शिकायतकर्ता ने सवाल उठाए हैं। संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने और उन्हें व्हाट्सएप के माध्यम से भेजने की बात कही जाने का भी दावा किया गया है।यदि शिकायत पुलिस के संज्ञान में थी तो प्रारंभिक जांच और दस्तावेजी कार्रवाई किस स्तर पर हुई, यह भी अब जांच का विषय बन गया है।
*_भ्रष्टाचार या लापरवाही,जांच से ही खुलेगा राज_*
लामाटोला का मामला अब केवल एक मंगल भवन के निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है। बार-बार शिकायत, निरीक्षण, नापजोख और कथित स्थगन आदेश के बावजूद यदि निर्माण को लेकर विवाद बना रहा, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर प्रशासनिक स्तर पर ऐसी स्थिति क्यों बनी।
क्या यह विभागीय लापरवाही का मामला है, किसी स्तर का दबाव है या किसी अन्य आर्थिक हित से जुड़ा विषय हैइन सवालों का निष्कर्ष बिना निष्पक्ष जांच के निकालना उचित नहीं होगा।
अब जबकि कलेक्टर द्वारा पुनः जांच दल गठित किए जाने की जानकारी सामने आई है,उम्मीद है कि जांच में दस्तावेजों से लेकर मौके की वास्तविक स्थिति तक बिंदुवार पड़ताल की जाएगी।कलेक्टर द्वारा पुनः जांच दल गठित किए जाने के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जांच केवल कार्यालयीन दस्तावेजों तक सीमित रहती है या जांच दल मौके पर पहुंचकर भूमि, निर्माण, राजस्व रिकॉर्ड, स्थगन आदेश और पंचायत के अभिलेखों का भी मिलान करता है।
लामाटोला का यह मामला पूरे जिले के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सवाल सिर्फ एक मंगल भवन का नहीं है। सवाल यह है कि जब किसी विवादित भूमि की जानकारी पहले ही प्रशासन के संज्ञान में पहुंच जाए, तो उसके बाद भी निर्माण कार्य जारी रहने की स्थिति कैसे बनी?
अब कलेक्टर के निर्देश के बाद उम्मीद की जा रही है कि पुनः जांच में पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने आएगी और यदि कहीं लापरवाही या अनियमितता प्रमाणित होती है तो संबंधित स्तर पर जिम्मेदारी भी तय की जाएगी।
फिलहाल सभी आरोप और दावे जांच के अधीन हैं। मामले में अंतिम स्थिति जांच रिपोर्ट और संबंधित प्रशासनिक कार्रवाई के बाद ही स्पष्ट होगी।


