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September 27, 2026
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हेल्थ एंड साइंस

कार्डियक अरेस्ट में जान बचाएंगे ड्रोन! डिफिब्रिलेटर पहुंचाने का कर सकते हैं काम



नई दिल्ली, 26 सितंबर  आसमान में उड़ने वाले ड्रोन अब सिर्फ तस्वीरें खींचने या सामान पहुंचाने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि किसी की जिंदगी बचाने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। शनिवार को ‘यूरोपियन इमरजेंसी मेडिसिन कांग्रेस’ में पेश की गई एक स्टडी के अनुसार, ड्रोन का इस्तेमाल ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलेटर (एईडी) को उस जगह तक पहुंचाने के लिए किया जा सकता है जहां किसी व्यक्ति को अस्पताल के बाहर कार्डियक अरेस्ट हुआ हो।



कार्डियक अरेस्ट के मामले में समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। भारत में हुए अध्ययनों के अनुसार, कार्डियक अरेस्ट के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और अब यह कम उम्र के लोगों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। इंडियन हार्ट एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय पुरुषों में आधे से अधिक दिल के दौरे 50 वर्ष से कम आयु में और एक चौथाई 40 वर्ष से कम आयु में होते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, सीपीआर और डिफिब्रिलेशन में हर एक मिनट की देरी से जीवित बचने की संभावना करीब 10 फीसदी कम हो सकती है।

ऐसे में सवाल यह है कि अगर एम्बुलेंस पहुंचने में समय लग रहा हो तो डिफिब्रिलेटर मरीज तक पहले कैसे पहुंचाया जाए। फ्रांस के शोधकर्ताओं ने इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए ड्रोन के इस्तेमाल की संभावनाओं का अध्ययन किया।

फ्रांस के क्रेतेइल में हेनरी-मोंडोर यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में इमरजेंसी मेडिसिन के प्रोफेसर मैथ्यू हेडेट ने कहा, “ईएमएस (इमरजेंसी मेडिकल सर्विस) संगठनों और ईएमएस डॉक्टरों के तौर पर हमारा मकसद है कि कार्डियक अरेस्ट के मरीजों को जल्द से जल्द डिफिब्रिलेशन मिल सके।”

शोधकर्ताओं ने ग्रेटर पेरिस क्षेत्र के उन इलाकों के 28,349 आउट-ऑफ-हॉस्पिटल कार्डियक अरेस्ट मामलों का विश्लेषण किया, जो 2011 से 2024 के बीच सामने आए थे। अध्ययन में सेंट्रल पेरिस को शामिल नहीं किया गया। इन मामलों के स्थान की तुलना वहां मौजूद 1,893 स्थायी एईडी की लोकेशन से की गई।

नतीजे बताते हैं कि मौजूदा व्यवस्था से हर मरीज तक समय पर डिफिब्रिलेटर पहुंचाना आसान नहीं है। केवल 30 फीसदी कार्डियक अरेस्ट के मामले ऐसे स्थानों पर हुए, जहां निकटतम स्थायी एईडी तक 500 मीटर की नेटवर्क दूरी थी।

अगर 84.5 फीसदी मामलों को 500 मीटर के दायरे में लाना हो तो 910 और स्थायी एईडी लगाने पड़ेंगे। वहीं 100 फीसदी कवरेज के लिए 1,712 अतिरिक्त एईडी की जरूरत पड़ेगी।

यहीं ड्रोन इस तस्वीर को बदल सकते हैं। शोधकर्ताओं के मॉडल के मुताबिक, करीब 3.9 किलोमीटर के दायरे में काम करने वाले ड्रोन बेस बनाए जाएं तो कम संख्या में अतिरिक्त उपकरणों के साथ काफी ज्यादा इलाकों को कवर किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, 100 ड्रोन बेस और केवल 26 अतिरिक्त स्थायी एईडी के साथ 97 फीसदी से ज्यादा कार्डियक अरेस्ट मामलों को कवर किया जा सकता था।

200 ड्रोन बेस के मॉडल में सिर्फ चार अतिरिक्त स्थायी एईडी के साथ 99 फीसदी से ज्यादा मामलों को कवर करने की संभावना सामने आई।

शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि मौजूदा सड़क व्यवस्था से किसी स्थायी एईडी को घटनास्थल तक पांच मिनट के भीतर लाना कितना संभव है। मॉडल में केवल 30 से 40 फीसदी मामलों में ऐसा संभव पाया गया। इसके मुकाबले ड्रोन आधारित मॉडल में एईडी को पांच मिनट के भीतर लगभग सभी संबंधित मामलों तक पहुंचाने की क्षमता दिखाई दी। एक संयुक्त मॉडल में 200 ड्रोन बेस और 871 मौजूदा स्थायी एईडी के साथ करीब 99.4 फीसदी मामलों को कवर करने का अनुमान लगाया गया।

इमरजेंसी मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. हिलेरी मिंका के नेतृत्व वाली टीम का कहना है कि ड्रोन खास तौर पर शहरों के बाहरी इलाकों, ग्रामीण क्षेत्रों और ऐसे स्थानों में उपयोगी हो सकते हैं जहां सड़क से पहुंचने में ज्यादा समय लगता है।

इस व्यवस्था में ड्रोन को किसी आपातकालीन कॉल के बाद सीधे घटनास्थल की ओर भेजा जा सकता है। आपातकालीन सेवा का डिस्पैच सेंटर कार्डियक अरेस्ट की सूचना मिलने पर ड्रोन को सक्रिय कर सकता है। ड्रोन स्वचालित उड़ान मार्ग से घटनास्थल तक पहुंच सकता है और अंतिम चरण में प्रशिक्षित ड्रोन पायलट उसकी निगरानी कर सकता है।

ड्रोन के पहुंचने के बाद एईडी को घटनास्थल पर मौजूद व्यक्ति मरीज के इस्तेमाल में ला सकता है। इसका मतलब यह है कि एम्बुलेंस के पहुंचने का इंतजार करते हुए सीपीआर और डिफिब्रिलेशन की प्रक्रिया पहले शुरू हो सकती है।

हालांकि, यह तकनीक अभी पूरी तरह से सामान्य चिकित्सा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनी है। मौजूदा अध्ययन कंप्यूटर मॉडल पर आधारित है और इसमें वास्तविक परिस्थितियों में बड़े पैमाने पर ड्रोन तैनात करके परिणाम नहीं जांचे गए हैं। अध्ययन को अभी ‘पीयर रिव्यू’ भी नहीं किया गया है। शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि ड्रोन की लागत को इस तकनीक की व्यवहारिकता के आकलन में शामिल करना जरूरी होगा।

स्वीडन में एईडी पहुंचाने के लिए ड्रोन का वास्तविक परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा चुका है। 2020 के एक पायलट अध्ययन में ड्रोन से एईडी पहुंचाना संभव पाया गया था और कुछ मामलों में ड्रोन एम्बुलेंस से पहले घटनास्थल पर पहुंचा।

हालांकि विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि ड्रोन एम्बुलेंस का विकल्प नहीं हो सकते। उनका उद्देश्य आपातकालीन चिकित्सा टीम के पहुंचने से पहले एईडी उपलब्ध कराकर शुरुआती कुछ मिनटों को ज्यादा प्रभावी बनाना है।

कार्डियक अरेस्ट में यही शुरुआती मिनट जिंदगी और मौत के बीच का अंतर बन सकते हैं इसलिए आने वाले समय में अस्पताल से बाहर होने वाले कार्डियक अरेस्ट के मामलों में एम्बुलेंस के साथ आसमान से आने वाला एक छोटा ड्रोन भी आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है।

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