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*16 वर्षीय जिगर की मौत के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था कटघरे में,*
सिवनी(गंगेरूवा)/Electro-Homoeopathy की वैधानिक स्थिति पर भी सवाल—क्लिनिक सील करने की मांग
ग्राम पंचायत गंगेरूवा के बस स्टैंड पर संचालित बताए जा रहे ‘डॉ. दीपक ठाकुर दवाखाना’ को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। क्लिनिक से जुड़े परिचय में B.E.M.S. (Bachelor of Electro-Homoeopathy Medicine and Surgery) का उल्लेख बताया जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब Electro-Homoeopathy को आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है, तो इस नाम से संचालित संस्थान में एलोपैथिक दवाओं, ड्रिप और इंजेक्शन के इस्तेमाल की अनुमति किस आधार पर है और संबंधित विभाग इसकी जांच क्यों नहीं कर रहा?
*सरकारी रिकॉर्ड में Electro-Homoeopathy की मान्यता पर सवाल*
भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के रिकॉर्ड में Electro-Homoeopathy को मान्यता प्राप्त चिकित्सा प्रणाली नहीं बताया गया है। वहीं Electro Homoeopathic Practitioners Association of India बनाम A.P. Verma मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय में भी Electro-Homoeopathy की वैधानिक मान्यता से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज हैं। न्यायिक रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि किसी संस्था का प्रमाणपत्र या पंजीयन मात्र व्यक्ति को कानूनन चिकित्सा करने का अधिकार नहीं देता; इसके लिए संबंधित कानून के तहत मान्य योग्यता और वैधानिक पंजीयन आवश्यक होता है।
*फिर एलोपैथिक ड्रिप और इंजेक्शन किस अधिकार से?*
यहीं से गंगेरूवा के कथित दवाखाने को लेकर सबसे गंभीर सवाल सामने आता है। यदि संबंधित व्यक्ति के पास केवल B.E.M.S. की योग्यता है और MBBS अथवा आधुनिक चिकित्सा की अन्य मान्य योग्यता तथा वैध मेडिकल रजिस्ट्रेशन नहीं है, तो उसके द्वारा एलोपैथिक दवाओं, IV ड्रिप अथवा इंजेक्शन दिए जाने की वैधानिकता की जांच आवश्यक है। सवाल यह भी है कि स्वास्थ्य विभाग, CMHO कार्यालय और संबंधित अधिकारी ऐसे संस्थानों का निरीक्षण किस आधार पर करते हैं और यदि नियमों का उल्लंघन मिलता है तो कार्रवाई क्यों नहीं होती?
*16 वर्षीय जिगर की मौत ने बढ़ाई चिंता*
इसी दवाखाने में 16 वर्षीय जिगर पंचेश्वर, निवासी सलंग टोला, के उपचार को लेकर भी उसके पिता घनश्याम पंचेश्वर ने गंभीर आरोप लगाए हैं। पिता के अनुसार तबीयत बिगड़ने पर वे जिगर को सुबह दवाखाने ले गए, जहां कथित रूप से ड्रिप और दो इंजेक्शन लगाए गए। परिवार का कहना है कि शाम को जिगर की हालत और बिगड़ गई और उसे जिला अस्पताल सिवनी ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
हालांकि, जिगर की मृत्यु सीधे उक्त उपचार या किसी विशेष इंजेक्शन के कारण हुई—यह बात अभी सरकारी चिकित्सकीय/फॉरेंसिक प्रमाण के बिना निश्चित रूप से नहीं कही जा सकती। मृत्यु का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम, मेडिकल रिकॉर्ड, इस्तेमाल की गई दवाओं की पहचान और विशेषज्ञ जांच से ही स्पष्ट हो सकता है। लेकिन एक नाबालिग की मौत और उसके पहले हुए कथित उपचार की परिस्थितियां निष्पक्ष जांच की मांग जरूर करती हैं।
*स्वास्थ्य विभाग से अब सीधा सवाल*
स्थानीय स्तर पर मांग उठ रही है कि प्रशासन संबंधित क्लिनिक की तत्काल जांच करे, संचालक की वास्तविक शैक्षणिक योग्यता और मेडिकल रजिस्ट्रेशन सत्यापित करे, क्लिनिक में इस्तेमाल दवाओं एवं इंजेक्शनों का रिकॉर्ड जब्त कर उनकी जांच कराए और यदि नियमों का उल्लंघन मिले तो नियमानुसार क्लिनिक को सील कर संचालन बंद कराया जाए।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे कथित चिकित्सकीय संस्थान किसकी अनुमति और किस पंजीयन के आधार पर संचालित हो रहे हैं। जिगर के परिवार को न्याय और भविष्य में किसी अन्य परिवार के साथ ऐसी घटना न हो, इसके लिए स्वास्थ्य विभाग की निष्पक्ष कार्रवाई अब जरूरी मानी जा रही है।


