बालाघाट/आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार “वीर” ने 21 वर्ष की अवस्था में 27 अक्टूबर 1980 को जटाशंकर त्रिवेदी महाविद्यालय के राष्ट्रीय सेवा योजना केम्प में ग्राम धनसुवा गये थे, जहाँ जीर्ण-शीर्ष अवस्था में गोंसाई मंदिर देखा और उसकी साफ-सफाई, जीर्णोद्धार करवाया। जिसे देख पुरातत्व के प्रति आकर्षित हो गये। वहाँ से आने उपरान्त जिले के वनाच्छादित क्षेत्रों में पुरातात्विक अवशेष सर्वाधिक मात्रा में जर्जर अवस्था में बिखरे हुए थे, उनकी सूची बद्धत की और 14 सितम्बर 1984 को इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान का विधिवत गठन कर, आमजनों का ध्यान पुरातत्व के प्रति केन्दित करवाया।
तदुपरांत शासन-प्रशासन के सहयोग से 26 जनवरी 1988 को अस्थायी पुरातत्व संग्रहालय में जिले की धरोहरों को रखा। 1991-92 में स्थायी पुरातत्व संग्रहालय जिला योजना समिति के माध्यम से बनवाया। 1999 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय नई दिल्ली भारत सरकार के सहयोग से पुरातत्व संग्रहालय में सुदृढ़ीकरण, सवर्द्धन करवा कर आकर्षित बनवाया। 26 जनवरी 2017 को नैरोगेज बोगी तात्कालिक कलेक्टर भरत यादव के मार्गदर्शन परामर्श से स्थापित कर विश्व पटल पर बालाघाट इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान संग्रहालय को नई पहचान दी। इसी परिप्रेक्ष्य में 23 नवम्बर 2023 को नैरोगेज डीजल इंजन डाॅ.गिरीश कुमार मिश्रा कलेक्टर के माध्यम से स्थापित करवाया। इसी श्रृंखला में देवदत्त शर्मा द्वारा शेर शिकार किया था, उस ट्राफी को उनके पुत्र दीपक शर्मा ने 17 सितम्बर 2026 ने भेंट कर अमूल्य धरोहर को संरक्षित करवाकर एक नया अध्याय प्रारंभ हुआ। पुरातत्व संग्रहालय के विकास हेतु जिले के गणमान्य जनों का सहयोग भी सराहनीय रहा है।
आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार “वीर”, संग्रहाध्यक्ष, पुरातत्व संग्रहालय में अपनी नि:स्वार्थ भाव से शासन/प्रशासन/शोधार्थियों को सेवाएं दे रहे है। जहाँ 46 वर्ष पूर्ण कर 47 वर्ष में प्रवेश कर रहें है। डाॅ.गहरवार को पुरातात्विक/साहित्यिक/पर्यावरण/समसामयिक क्षेत्रों में 7,600 के ऊपर शासन/प्रशासन/राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पर संस्थाओं से सम्मान, अभिनन्दन-पत्रों, प्रशस्ति-पत्रों, सम्मान-पदकों से किया जा चुका है और विशेष सम्मानों हेतु नामांकित किया गया है। 75,000 के ऊपर पुरातत्व, इतिहास, पुरातत्व, साहित्य गद्य और पद्य प्रकाशित हुआ है। उन्होंने बालाघाट जिले के पुरातात्विक क्षेत्रों में शोध किया और “वैनगंगा घाटी का इतिहास, पुरातत्व, साहित्य, संस्कृति” पर शोध ग्रंथ 11 जनवरी 2011 तथा “बालाघाट जिले की प्राचीन मूर्ति कलात्मक, इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान संग्रहालय परिदृश्य” पर भी शोध ग्रंथ 26 जनवरी 2022 को प्रकाशित करवाया, जिसके परिप्रेक्ष्य में शोध छात्र/छात्राएँ, पर्यटक लाभान्वित हो रहे है। पुरातत्व संग्रहालय में प्रतिदिन शोध विधार्थियों, भारतीय-विदेशी पर्यटकों का आवागमन होता रहता है। जिन्हें अपने पुरातात्विक अनुभवों से उन्हें नि:स्वार्थ भाव से ज्ञानादित कर रहे है।
साथ ही आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार “वीर” के नाम पर भारतीय डाक टिकट 27 मई 2022 को जारी हुआ है तथा विश्व रत्न सम्मान 15 अगस्त 2022 को शून्य से शिखर फाउंडेशन मुंबई के द्वारा सम्मानित किया गया है। डॉ.गहरवार का नाम नोबेल नामांकित है। इसके अतिरिक्त इन्हें वर्ल्ड पार्लियामेंट की मेंबरशिप भी दी गई है, पूर्व में अंतर्राष्ट्रीय शोध सलाहकार सदस्य से भी नवाजा गया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष, इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासंघ भारत तथा राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक हजार संस्थाओं से सम्बद्धता रखी है। जो जिलें के लिए बहुत बड़ी उपलब्धियां है।
डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार भविष्य में बालाघाट जिले में जो अवशेष यत्र-तत्र बिखरे हुए है, उनकी सूची जनपद पंचायत स्तर पर तैयार करवाकर, पंजीयन प्रपत्र भरवा रहे है, उन प्रतिमाओं के पीलर बनाकर, उसमें नाम, काल, स्थल का नाम अंकित कर संरक्षित करने की कार्य योजना तैयार कर ली हैं तथा पंचायत स्तर पर उन स्थलों की पुस्तिका प्रकाशित कर पर्यटकों, शोधार्थियों को सहयोग प्रदान करना इनका उद्देश्य है।
*-डाॅ.कविता गहरवार*
अध्यक्ष,
इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान,
बालाघाट (मध्यप्रदेश)


