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10वीं शताब्दी के मां महालक्ष्मी मंदिर में दीपदान की परंपरा, प्राचीन मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है दीपोत्सव
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शहडोल 7 नवंबर 2026- दीपावली का पर्व भारतीय संस्कृति में सुख, समृद्धि, खुशहाली और आस्था का प्रतीक है। इस अवसर पर घर-आंगन से लेकर मंदिरों तक दीपों की रोशनी दिखाई देती है। मध्यप्रदेश के शहडोल संभाग सहित कटनी, दमोह, सिवनी और नरसिंहपुर अंचल के अनेक प्राचीन मंदिर दीपावली पर श्रद्धा और आस्था के प्रमुख केंद्र बन जाते हैं। इन मंदिरों में सदियों पुरानी परंपराओं के अनुसार दीपदान, विशेष पूजन, अभिषेक, श्रृंगार और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। कहीं श्रद्धालु पांच दीप प्रज्ज्वलित कर मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं, तो कहीं सहस्र अर्चन, हवन और अन्नकूट महोत्सव के माध्यम से दीपोत्सव मनाया जाता है।
शहडोल जिले के ग्राम सिंदूरी स्थित डोंगरगढ़ पहाड़ी पर विराजमान मां महालक्ष्मी का प्राचीन मंदिर दीपावली पर विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। जिला मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर खोलाड़ रोड पर स्थित इस मंदिर में दीपदान की विशेष परंपरा है। श्रद्धालु मां महालक्ष्मी की आराधना के लिए कम से कम पांच दीपक प्रज्ज्वलित करते हैं तथा मीठे प्रसाद का भोग लगाते हैं। मंदिर के पुजारी श्री उमाशंकर तिवारी के अनुसार मां महालक्ष्मी की प्रतिमा का निर्माण कलचुरी काल में 10वीं शताब्दी में हुआ था। कमल के आसन पर विराजमान मां महालक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की प्रतिमा भी स्थापित है। पुराणों में वर्णित मान्यताओं के आधार पर स्थानीय लोग इस स्थान को माता भुवनेश्वरी के रूप में भी पूजते हैं। यहां रूप चौदस से ही विशेष पूजन प्रारंभ हो जाता है और दीपावली पर मां की विशेष आराधना की जाती है।
सिवनी के लक्ष्मीनारायण मंदिर में आकर्षक श्रृंगार और विशेष पूजन
सिवनी के बस स्टैंड स्थित प्रसिद्ध लक्ष्मीनारायण मंदिर में दीपावली के अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। मंदिर में भगवान लक्ष्मीनारायण की भव्य एवं मनोहारी प्रतिमाएं स्थापित हैं। आकर्षक पोशाक और विशेष श्रृंगार के साथ भगवान का स्वरूप श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। मंदिर में 12 वर्षों से सेवा कर रहे पंडित श्री शंकर लाल तिवारी के अनुसार मंदिर की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा 12 मई 2013 को ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के करकमलों से संपन्न हुई थी। मंदिर के मुख्य आचार्य श्री हेमंत द्विवेदी हैं। दीपावली के अवसर पर प्रतिदिन 1008 नामों से अर्चन किया जा रहा है। दीपावली के अगले दिन अन्नकूट पूजन एवं भंडारे का आयोजन भी किया जाएगा।
नरसिंहपुर में रात्रि 12 बजे तक होंगे मां महालक्ष्मी के दर्शन
नरसिंहपुर के बाहरी रोड स्थित अष्टांग चिकित्सालय के पीछे स्थापित महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। पर्व के अवसर पर सुबह से ही मां भगवती महालक्ष्मी का अभिषेक और आकर्षक श्रृंगार किया जाता है। श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मंदिर के पट सुबह से रात्रि 12 बजे तक खुले रखे जाते हैं। मंदिर के पुजारी पंडित श्री नरेंद्र महाराज के अनुसार दीपावली की रात 9 बजे से मां महालक्ष्मी का सहस्र अर्चन एवं हवन किया जाता है। क्षेत्र में मां महालक्ष्मी का यह एकमात्र मंदिर माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार दीपावली पर मां लक्ष्मी की विशेष आराधना करने से घर में सुख, समृद्धि और खुशहाली आती है।
दमोह के नोहलेश्वर मंदिर में अष्ट लक्ष्मी के आठ दिव्य स्वरूप
दमोह-जबलपुर राज्य मार्ग पर ग्राम नोहटा स्थित 9वीं शताब्दी का प्राचीन नोहलेश्वर शिव मंदिर अपनी विशिष्ट स्थापत्य कला और धार्मिक महत्ता के लिए प्रसिद्ध है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की बाहरी दीवारों और परिक्रमा पथ पर देवी लक्ष्मी के आठ दिव्य स्वरूपों की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित हैं। इनमें आदि लक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, ऐश्वर्य लक्ष्मी और धन लक्ष्मी शामिल हैं। विशाल चबूतरे पर निर्मित इस ऐतिहासिक मंदिर में अष्ट लक्ष्मी की प्रतिमाएं भारतीय शिल्पकला और धार्मिक आस्था के अद्भुत संगम को प्रदर्शित करती हैं। लोक मान्यता है कि अष्ट लक्ष्मी के दर्शन से भक्तों को धन, विद्या, वैभव, शक्ति और आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है।
कटनी के मंदिरों में धनतेरस से देवउठनी एकादशी तक धार्मिक आयोजन
कटनी शहर में भी दीपावली के अवसर पर प्राचीन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन होते हैं। शहर के शेर चौक स्थित श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर में प्रतिदिन सुबह 5 बजे मंगल आरती, सुबह 7 बजे श्रृंगार आरती, शाम 7 बजे संध्या आरती और रात्रि 9:30 बजे शयन आरती की परंपरा है। संध्या आरती में स्थानीय दुकानदार और श्रद्धालु भी सहभागिता करते हैं।
वहीं कमानिया गेट स्थित महालक्ष्मी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। वर्ष 1913 में निर्मित इस मंदिर में धनतेरस से विशेष पूजा-पाठ प्रारंभ होता है, जो देवउठनी एकादशी तक चलता है। इसके अतिरिक्त शहर का श्री सत्यनारायण मंदिर भी धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है। दीपावली पर यहां विशेष पूजा-अर्चना और अन्नकूट महोत्सव आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर पारंपरिक व्यंजनों से तैयार छप्पन भोग का प्रसाद श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है।
सदियों पुरानी परंपराओं में जीवंत है आस्था और सांस्कृतिक विरासत
शहडोल संभाग सहित आसपास के जिलों के ऐतिहासिक मंदिरों में दीपावली का उत्सव केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी समृद्ध धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत को भी जीवंत बनाए रखता है। अलग-अलग मंदिरों में प्रचलित दीपदान, विशेष श्रृंगार, सहस्र अर्चन, हवन और अन्नकूट जैसी परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही हैं। दीपावली पर इन प्राचीन मंदिरों में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक समय में भी लोगों की आस्था अपनी सदियों पुरानी परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है।


