जयपुर, 18 मई | पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने गहलोत सरकार पर जयपुर सीरियल ब्लास्ट मामले को हल्के में लेने और तुष्टिकरण की नीति अपनाने का आरोप लगाया है। उन्होंने राज्य सरकार पर हमला बोलते हुए ट्वीट किया, ”सरकार ने जानबूझकर इतने गंभीर मामले को हल्के में लिया, नहीं तो निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी बरकरार रखते। इस मामले में महाधिवक्ता ने 45 दिन तक वकालत नहीं की, ऐसे में संदेह है कि क्या सरकार के इशारे पर ऐसा हुआ है? उनकी प्रतिक्रिया बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद आई। सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर सीरियल ब्लास्ट के चारों आरोपियों को बरी करने के हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। विस्फोट मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारियों को राहत देते हुए उनके खिलाफ जांच के फैसले पर रोक लगा दी है। यह केस अब चीफ जस्टिस की बेंच को भेजा जाएगा। अगली सुनवाई नौ अगस्त को होगी।
राजे ने मामले में कांग्रेस को दोषी ठहराया, और कहा, मई 2008 में, जयपुर बम विस्फोट कांड, जिसने गुलाबी शहर को रक्त-रंजित कर दिया, 80 लोग मारे गए और विकलांग हो गए, कांग्रेस सरकार ने ठीक से काम नहीं किया। सुप्रीमकोर्ट का यह फैसला उसी का परिणाम है।
उन्होंने कहा, ”क्या इस सरकार के कानों तक पीड़ितों की चीख नहीं पहुंचती? क्या तुष्टीकरण के कारण सरकार ने ऐसा नहीं किया?”
भाजपा नेता ने कहा, इसमें जिस तरह की लापरवाही की गई, उससे साफ है कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार दोषी है। सरकार की मंशा के मुताबिक जयपुर बम ब्लास्ट के आरोपित भले ही फिलहाल बरी हो गए हों, लेकिन उनके कुशासन से पीड़ित जनता निश्चित रूप से समय पर इसका जवाब देगी।
गौरतलब है कि 13 मई 2008 को जयपुर शहर आठ जगहों पर सिलसिलेवार बम धमाकों से दहल उठा था। 29 मार्च को, राजस्थान उच्च न्यायालय ने मामले में चार लोगों को बरी कर दिया, जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2019 में मौत की सजा सुनाई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (18 मई) को उन चार लोगों को रिहा करने का आदेश दिया, जिन्हें राजस्थान उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस निर्देश पर भी रोक लगा दी, जिसमें डीजीपी को जांच करने वाले एटीएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा गया था।
जस्टिस अभय एस ओका और राजेश बिंदल की खंडपीठ ने बुधवार को राज्य सरकार की एसएलपी की सुनवाई को मंजूरी देते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से मामले का रिकॉर्ड पेश करने को कहा है। इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार को दी गई है। कोर्ट ने कहा कि यह मामला डेथ रेफरेंस से जुड़ा है। ऐसे में इसे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा जाना चाहिए, ताकि 9 अगस्त को अगली सुनवाई के लिए तीन जजों की बेंच का गठन किया जा सके।


