
(Advocate, Supreme Court of India).
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कल, मैं सुप्रीम कोर्ट में अपनी बारी का इंतजार कर रहा था, जब एक महिला एडवोकेट अपने तलाक के मामले में याचिकाकर्ता के रूप में व्यक्तिगत रूप से पेश हुई। माननीय उच्चतम न्यायालय पीठ याचिकाकर्ता (पत्नी) की दलीलों से खासा नाराज थी, क्योंकि सुनवाई के पिछले अवसर पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता की एक निश्चित अंतिम राशि के लिए आदेश पारित किया था औ अंतिम र समझौता करवाया था, जिस पर याचिकाकर्ता पत्नी सहमत थी। जिला फैमिली कोर्ट में भी मोजूदा स्थिति रिपोर्ट दाखिल की गई। लेकिन अब याचिकाकर्ता पत्नी उस राशि पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं थी, जिस पर उसने पिछली तारीख पर हामी भर समझौता किया था। इससे सुप्रीम कोर्ट की बेंच बेहद नाराज हो गई और बेंच ने कहा कि वे पूरी याचिका खारिज करने जा रहे हैं और पत्नी को गुजारा भत्ता के रूप में ली गई अग्रिम राशि पति को वापस करनी होगी और दोनों पक्षों को वापिस जिला फैमिली कोर्ट में तलाक का मामला लड़ना होगा। इससे याचिकाकर्ता पत्नी को पुनर्विचार करना पड़ा और उसने तुरंत माफी मांगी तथा गुजारा भत्ता की शेष राशि से मामले को समाप्त करने पर सहमति व्यक्त की।
इससे हमें यह संकेत मिलता है कि किस तरह तलाक और दहेज के मामलों का दुरुपयोग करके पति और उसके परिवार को परेशान करने और वास्तविक जरूरतमंद महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करने के लिए मुकदमेबाजी को लंबा खींचकर अतिरिक्त धन उगाही की जा रही है।
अभी कुछ दिन पहले ही मुंबई में एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, जिसमें अतुल सुभाष नामक एक पति ने आत्महत्या कर ली। श्री सुभाष ने आत्महत्या के अपने बयान में कहा है कि वह अपनी पत्नी और पत्नी के परिवार द्वारा लगातार उत्पीड़न और परेशान किए जाने से और कुटुंब न्यायालय द्वारा पत्नी के पक्ष में पक्षपातपूर्ण तरीके से मुकदमा चलाए जाने के कारण आत्महत्या कर रहा है। इस मामले ने इन कानूनों के बारे में कुछ वैध और चिंताजनक बिंदुओं को उजागर किया है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक अन्य मामले में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति प्रसन्ना की पीठ ने इसी तरह के एक अन्य मामले में अपने आदेश में कुछ बिंदुओं पर जोर दिया। पीठ ने यह स्पष्ट किया कि पत्नी को भरण-पोषण देने का उद्देश्य पति को दंडित करना नहीं है। हम बस इतना ही चाहते हैं कि पत्नी और बच्चे सम्मानजनक जीवन जी सकें।
कुछ दिन पहले ही एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं द्वारा अपने पति और उनके परिवार के खिलाफ दर्ज कराए गए वैवाहिक विवाद के मामलों में कानूनों का दुरुपयोग करने के खिलाफ सख्त चेतावनी जारी की है। माननीय जस्टिस बी0वी0 नागरत्ना की बेंच ने कहा कि इन कानूनों का इस्तेमाल “व्यक्तिगत प्रतिशोध के साधन” के रूप में नहीं किया जा सकता। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498 (ए) के तहत पति और उसके परिवार के खिलाफ दायर पत्नी पर क्रूरता के मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की, जिसमें कुछ दिन पहले तेलंगाना उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करने या खारिज करने से इनकार कर दिया था।
एक और मामला है जिसका मैं यहां उल्लेख करना चाहूंगा और उसी मामले की सुनवाई का वीडियो इंटरनेट पर सनसनीखेज रूप से वायरल है। उस मामले में पति का दावा है कि पत्नी उसके साथ कुल मिलाकर केवल एक महीने तक रही और बाद में वह अपने माता-पिता के घर चली गई। उसने अंतिम गुजारा भत्ता के रूप में 40 लाख रुपये की मांग की, जबकि उसे पहले से ही 50 हजार रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता मिल रहा था। वह काफी ज्यादा लंबे समय से पति के घर वापस भी नहीं आई थी। उच्च न्यायालय की पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले को निपटा लें क्योंकि यह जबरन वसूली का मामला नहीं है, जहां पत्नी सिर्फ मांगती रहे और पति बस भुगतान करता रहे।
मैं हाल ही में मैं एक ऐसे मामले से जुड़ा था, जिसमें माता-पिता की इकलौता पुत्र लड़ाकू विमान प्रशिक्षण के दौरान शहीद हो गया था। बहू (जिसका पति से मृत्यु से ठीक पहले से ही खराब संबंध चल रहा था) ने वायुसेना द्वारा दी गई सारी क्षतिपूर्ति राशि और संपत्ति ले ली, साथ ही उसने शहीद के माता-पिता को कुछ राशि पर कानूनी वसूली नोटिस भेजा, जो कि शहीद के माता-पिता के बैंक खाते में जमा थी। अब अकेले रह गए बूढ़े माता-पिता अपने घर से बहुत दूर शहर में केस लड़ रहे हैं।
मेरी राय में, वास्तविक मामले न्यायालय में सालों साल लंबित पड़े रहते हैं और जो महिलाएँ पहले से ही सशक्त और अच्छी तरह से व्यवस्थित हैं, वे इन कानूनों का मनमाने ढंग से अपने पक्ष में उपयोग कर रही हैं। आर्थिक रूप से समाज के निचले तबके की गरीब महिलाएँ और जो वास्तविक पीड़िताएं हैं, वे इन कानूनों के तहत अपने अधिकारों की माँग करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाती हैं और वे अपनी दुर्दशा पर चुप रहती हैं। ज्यादातर पीड़िताओं को इन कानूनों के बारे में जानकारी ही नहीं है!
दोनों पक्षों के इस तरह के उत्पीड़न का समाधान विवाह से पहले विवाह-पूर्व समझौते (प्रीनपशियल काॅंट्रैर्क्ट) की प्रणाली को लागू करना है, ठीक वैसे ही जैसे कई पश्चिमी देश इस प्रणाली का पालन कर रहे हैं। एक विवाह-पूर्व प्रणाली या संक्षेप में प्रीनप एक समझौता या अनुबंध है जिसे एक जोड़े के बीच विवाह से ठीक पहले हस्ताक्षरित किया जाता है जिसमें यह तय किया जाता है कि भविष्य में तलाक या अलग होने पर उनकी संपत्ति, ऋण और देनदारियों को कैसे दोनों के मध्य विभाजित किया जाएगा।
आधुनिक समय में आधुनिक समाधानों की आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि हम आगे बढ़ें और पश्चिम के आधुनिक तलाक कानूनों की ओर देखें।


