ये कहानी लगभग हर दूसरे घर की है। रात को पूरे जोश के साथ 5 बजे का अलार्म सेट होता है, जिम के कपड़े निकालकर रखे जाते हैं, और मन में सिक्स-पैक एब्स के सपने तैर रहे होते हैं। लेकिन जैसे ही सुबह अलार्म बजता है, एक अदृश्य शक्ति हमें रजाई के अंदर खींच लेती है। दिमाग में एक ही आवाज़ गूंजती है – “बस 5 मिनट और…” और वो 5 मिनट कब एक घंटे में बदल जाते हैं, पता ही नहीं चलता।
तो आखिर गलती कहाँ हो रही है? क्या हम आलसी हैं? शायद नहीं। असल में, ये हमारे दिमाग और आदत की लड़ाई है। हमारा दिमाग हमेशा आराम और तुरंत मिलने वाली खुशी को चुनता है, और सुबह की मीठी नींद से ज़्यादा आरामदायक कुछ भी नहीं। जिम का फायदा महीनों बाद दिखेगा, लेकिन रजाई का सुख तो अभी मिल रहा है!
तो इस रोज़ की जंग को जीतें कैसे? आइए, कुछ हथियारों पर नज़र डालते हैं:
- छोटे कदम से शुरुआत करें: पहले दिन ही एक घंटे का हार्डकोर वर्कआउट करने का टारगेट मत बनाइए। ये पहाड़ जैसा लगता है। बस उठने की आदत डालें। पहले हफ्ते सिर्फ़ उठकर 10 मिनट वॉक करें या घर पर ही कुछ स्ट्रेचिंग करें। जब शरीर को आदत हो जाएगी, तो जिम जाना आसान लगेगा।
- रात की तैयारी है असली हीरो: सुबह के लिए कुछ भी काम मत छोड़िए। जिम के कपड़े, जूते, पानी की बोतल, यहाँ तक कि आपका प्री-वर्कआउट स्नैक भी रात में ही तैयार रखें। सुबह उठकर बस तैयार होना हो, कुछ सोचना न पड़े। इससे फैसला लेने का झंझट खत्म हो जाता है।
- अपना ‘क्यों’ ढूंढें (Find Your ‘Why’): आप जिम क्यों जाना चाहते हैं? ‘फिट होना है’ – यह बहुत vague कारण है। क्या आप किसी पुरानी जींस में फिट होना चाहते हैं? क्या आप बिना हांफे सीढ़ियां चढ़ना चाहते हैं? या किसी बीमारी से दूर रहना चाहते हैं? अपना कारण जितना पर्सनल और इमोशनल होगा, मोटिवेशन उतना ही तगड़ा होगा। उसे कहीं लिख कर चिपका लें।
- एक दोस्त, सब दुरुस्त: एक ऐसा दोस्त या पार्टनर ढूंढें जो आपके साथ चले। जब आपको पता होता है कि कोई आपका इंतज़ार कर रहा है, तो बिस्तर से निकलना आसान हो जाता है। एक-दूसरे को मोटिवेट करना इस सफर को मज़ेदार बना देता है।
- सज़ा नहीं, मज़ा बनाओ: अगर आपको ट्रेडमिल पर दौड़ना बोरिंग लगता है, तो मत दौड़िए! डांस क्लास, ज़ुम्बा, स्विमिंग या कोई स्पोर्ट्स जॉइन करें। एक्सरसाइज़ को सज़ा की तरह नहीं, बल्कि एक मज़ेदार एक्टिविटी की तरह देखें जिसका आप इंतज़ार करें।
याद रखिए, ये एक दिन की दौड़ नहीं, बल्कि एक मैराथन है। अगर किसी दिन छूट भी जाए, तो खुद को कोसने के बजाय अगले दिन फिर से कोशिश करें। तो अगली बार जब अलार्म बजे, तो उसे दुश्मन नहीं, अपना सबसे अच्छा दोस्त समझिए जो आपको आपके बेहतर ‘आप’ से मिलाने के लिए आया है।


