April 4, 2026
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आज है संताली विजय दिवस, आदिवासी अंचलों से लेकर संसद तक गूंज रही 80 लाख लोगों की भाषा

रांची, 22 दिसंबर। संताली भाषा लिखने, बोलने और पढ़ने वाले देश-विदेश में फैले करीब 80 लाख से अधिक लोगों के लिए 22 दिसंबर बेहद अहम तारीख है। दशकों से उठती मांग और लंबे आंदोलन के बाद वर्ष 2003 में इसी तारीख को संताली को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया और तभी से इस दिन को संताली विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम के अलावा बांग्लादेश, नेपाल और भूटान के कई आदिवासी अंचलों की प्रमुख भाषा संताली अब गांवों की चौपालों तक सीमित नहीं रही। देश की संसद में भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है। लोकसभा की कार्यवाही का अनुवाद इसी वर्ष से संताली में शुरू हुआ है।

इस कदम से संताली भाषी क्षेत्र के लोगों को संसद की कार्यवाही अपनी मातृभाषा में समझने की सुविधा मिली है। संताली भाषा ऑस्ट्रोएशियाटिक भाषा परिवार की मुंडा शाखा से जुड़ी है और हो व मुंडारी से निकटता रखती है। संताली की विशिष्ट पहचान उसकी स्वदेशी ‘ओल चिकी’ लिपि है, जिसे 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने विकसित किया था। संताली भाषा झारखंड व पश्चिम बंगाल में दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा रखती है।

संताल समुदाय स्वयं को ‘होर’ या ‘होर होपोन’ यानी मानवजाति का पुत्र कहता है और अपनी भाषा को ‘होर रोर’ के नाम से जानता है। क्षेत्रीय स्तर पर इसके अलग-अलग नाम भी प्रचलित हैं। कहीं इसे जांगली या पहाड़िया कहा जाता है तो कहीं ठर या पारसी के नाम से जाना जाता है। हाल के वर्षों में भाषा और लिपि के संरक्षण के लिए सामाजिक स्तर पर भी प्रयास तेज हुए हैं।

आदिवासी सोशियो-एजुकेशनल एंड कल्चरल एसोसिएशन (आसेका) द्वारा झारखंड में करीब 100 गांवों में ‘ओल इतुन आसड़ा’ स्कूल चलाए जा रहे हैं, जहां निःशुल्क शिक्षा दी जा रही है। आसेका के सचिव शंकर सोरेन का कहना है कि भाषा का संरक्षण समाज की साझा जिम्मेदारी है। संताली अनुवादक मंगल माझी के अनुसार अब केजी से पीजी तक, यहां तक कि तकनीकी विषयों की पुस्तकें भी संताली में तैयार की जा रही हैं। झारखंड सरकार ने भी राज्य के 1080 स्कूलों में संताली सहित पांच जनजातीय भाषाओं में पढ़ाई की व्यवस्था कराई है। सीएम हेमंत सोरेन ने इन भाषाओं के लिए नियमित शिक्षकों की नियुक्ति का भी ऐलान किया है।

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