मध्यप्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले कलेक्टर पद को लेकर आमजन के बीच एक गहरी और चिंताजनक धारणा बन चुकी है कि बिना पैसा दिए कोई काम नहीं होता। यह धारणा सिर्फ अफ़वाह या राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि वर्षों से आम नागरिकों के अनुभवों से उपजी पीड़ा है। प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में सभी प्रशासनिक अधिकारियों के बीच में मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव का नाम लेकर यह कहा कि मुख्यमंत्री जी कहते हैं कि कलेक्टर बगैर पैसे लिए काम नहीं करते।इससे यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है। मुख्यमंत्री भी जानते हैं लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने से बच क्यों रहे हैं?
जमीन से जुड़े मामलों, राजस्व प्रकरणों, प्रमाण-पत्रों, योजनाओं की स्वीकृति या साधारण प्रशासनिक निर्णयों तक में ‘लेन-देन’ की चर्चा आम हो गई है।
कलेक्टर जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होता है। उससे निष्पक्षता, संवेदनशीलता और ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है। लेकिन जब जनता को यह महसूस होने लगे कि उसकी सुनवाई तभी होगी जब जेब गरम की जाए, तब लोकतांत्रिक शासन की आत्मा पर चोट होती है। अफ़सोस यह है कि यह भ्रष्टाचार सिर्फ निचले स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ऊपर तक मौन स्वीकृति जैसा माहौल बनता दिख रहा है।
सबसे अधिक नुकसान गरीब, किसान और कमजोर वर्ग को होता है। जिनके पास देने के लिए पैसा नहीं, उनके काम महीनों फाइलों में दबे रहते हैं। वहीं, रसूखदार और प्रभावशाली लोग चंद दिनों में काम निकलवा लेते हैं। इससे न केवल प्रशासन की साख गिरती है, बल्कि सामाजिक असमानता और अविश्वास भी गहराता है।
सरकारें भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को आईना दिखाती है। यदि कलेक्टर जैसे उच्च पदों पर बैठे अधिकारी भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हों, तो सवाल केवल व्यक्ति का नहीं, पूरी व्यवस्था का बन जाता है। विजिलेंस, लोकायुक्त और शिकायत पोर्टल तब तक प्रभावी नहीं हो सकते, जब तक शिकायतकर्ता को संरक्षण और निष्पक्ष कार्रवाई का भरोसा न मिले।
ज़रूरत है कि सरकार केवल नारे नहीं, ठोस कदम उठाए। कलेक्टर कार्यालयों में पारदर्शिता बढ़े, निर्णयों की समय-सीमा तय हो, और हर फ़ाइल की डिजिटल ट्रैकिंग अनिवार्य हो। साथ ही, भ्रष्टाचार के प्रमाण मिलने पर बिना दबाव के सख़्त कार्रवाई हो, चाहे अधिकारी कितना ही वरिष्ठ क्यों न हो।
मध्यप्रदेश की जनता ‘दया’ नहीं, अधिकार चाहती है। अगर प्रशासनिक तंत्र विश्वास खो देगा, तो शासन केवल आदेशों का ढांचा बनकर रह जाएगा। अब समय है कि सरकार कलेक्टर राज की इस काली छाया को स्वीकार करे और ईमानदार प्रशासन की ओर वास्तविक कदम बढ़ाए—वरना यह धारणा जल्द ही एक कड़वी सच्चाई बन जाएगी।


