मंदिर भारतीय समाज में केवल पूजा-स्थल नहीं, बल्कि समानता, समरसता और आत्मिक शांति के केंद्र रहे हैं। यहाँ राजा और रंक, अमीर और गरीब सब एक ही पंक्ति में ईश्वर के दर्शन करते थे। लेकिन बीते कुछ वर्षों में मंदिरों में पनपता वीआईपी कल्चर इस मूल भावना को लगातार कमजोर कर रहा है।
आज स्थिति यह है कि आम श्रद्धालु घंटों लंबी कतारों में खड़ा रहता है, जबकि वीआईपी पास, सिफारिश, रसूख या मोटी दक्षिणा के सहारे कुछ लोग मिनटों में गर्भगृह तक पहुँच जाते हैं। सवाल उठता है कि क्या भगवान के दरबार में भी सामाजिक और आर्थिक हैसियत के आधार पर भेदभाव स्वीकार्य है?
वीआईपी दर्शन की व्यवस्था अक्सर “व्यवस्था सुचारु रखने” या “विशिष्ट अतिथियों की सुरक्षा” के नाम पर जायज़ ठहराई जाती है। लेकिन हकीकत यह है कि यह व्यवस्था धीरे-धीरे आस्था के बाजारीकरण का रूप ले चुकी है। दर्शन की रफ्तार अब भक्ति से नहीं, बल्कि पैसे और पहचान से तय होने लगी है।
यह कल्चर न सिर्फ आम श्रद्धालु के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाता है, बल्कि मंदिरों की नैतिक विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करता है। जब ईश्वर के दरबार में भी विशेषाधिकार दिखने लगें, तो समाज में समानता और न्याय का संदेश कैसे जाएगा?
इतिहास गवाह है कि भक्ति आंदोलन ने जाति, वर्ग और सत्ता के भेद को चुनौती दी थी। संत कबीर से लेकर मीरा तक, सबने ईश्वर को जन-जन का बताया। ऐसे में आज मंदिरों में पनप रहा वीआईपी कल्चर उसी परंपरा के विपरीत खड़ा दिखाई देता है।
समाधान यह नहीं कि व्यवस्था पूरी तरह खत्म कर दी जाए, बल्कि यह है कि दर्शन व्यवस्था पारदर्शी, समान और संवेदनशील बने। विशेष परिस्थितियों—जैसे बुजुर्ग, दिव्यांग या आपात स्थिति—को छोड़कर, हर श्रद्धालु के लिए एक जैसी प्रक्रिया होनी चाहिए।
अंततः मंदिर अगर आस्था के लोकतंत्र को बचाए रखना चाहते हैं, तो उन्हें यह समझना होगा कि ईश्वर के सामने सब बराबर हैं। भगवान को वीआईपी नहीं, केवल भक्त चाहिए।


