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Jabalpur
June 18, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

प्रकृति का ‘कत्लेआम’: जहां शिक्षा की जड़ें सींची जानी थीं, वहां प्राचार्य ने पेड़ों पर चलवा दी कुल्हाड़ी


केवलारी (सिवनी)
एक ओर दुनिया ग्लोबल वार्मिंग के साये में थर-थर कांप रही है, भारत सरकार ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियानों से धरा को हरा-भरा करने में जुटी है, वहीं सिवनी जिले के केवलारी स्थित जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) में मानवता और प्रकृति को शर्मसार करने वाला एक वीभत्स मामला सामने आया है। संस्थान के प्राचार्य पी. एस. ठाकुर पर आरोप है कि उन्होंने शिक्षा के मंदिर को ‘श्मशान’ बनाते हुए प्रांगण के सैकड़ों फलदार और कीमती वृक्षों का बेरहमी से कत्लेआम कर दिया। तो कुछ पेड़ों आग लगाकर जला दिया साक्ष्य मिटाने के लिए।

सागौन और शीशम की ‘कब्र’ पर बना भ्रष्टाचार का मकबरा
यह केवल पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अपराध प्रतीत होता है। बताया जा रहा है कि बेशकीमती सागौन और शीशम के हरे भरे पेड़ों को धराशाही  करने के बाद, साक्ष्यों को मिटाने के लिए रोंगटे खड़े कर देने वाली साजिश रची गई। कुछ पेड़ों को परिसर से गायब कर दिया गया, तो कुछ को ईंट, गिट्टी और रेत के ‘गोल मकबरों’ के नीचे जिंदा दफन कर दिया गया।
क्या प्राचार्य महोदय इन मकबरों के नीचे पर्यावरण की हत्या के सबूत छुपाना चाहते थे , या फिर यह बेशकीमती लकड़ियों की तस्करी का कोई नया और खौफनाक तरीका है।
वन विभाग की चुप्पी और प्रशासन की नाक के नीचे तांडव
हैरानी की बात यह है कि जब सरकार एक सूखा पेड़ काटने के लिए भी कड़े नियमों का हवाला देती है, तब इतने बड़े पैमाने पर ‘हरियाली का नरसंहार’ कैसे हो गया? वन विभाग के अधिकारियों की नाक के नीचे कुल्हाड़ियां चलती रहीं और जिम्मेदार कुंभकर्णी नींद सोते रहे। स्थानीय निवासियों और पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश है कि आखिर किस नियम के तहत इन फलदार वृक्षों को काटा गया और इनकी अनुमति किसने दी।
प्राचार्य या ‘हरियाली के दुश्मन
संस्थान का मुखिया, जिसकी जिम्मेदारी आने वाली पीढ़ी को पर्यावरण और नैतिकता का पाठ पढ़ाना है, वही यदि ‘वृक्षहंता’ बन जाए, तो भविष्य अंधकारमय है। पृथ्वीपाल सिंह ठाकुर का यह कृत्य न केवल प्रशासनिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के ऑक्सीजन के अधिकार पर डकैती है।
मुख्य सवाल जो प्रशासन को झकझोर देंगे
क्या इन वृक्षों की कटाई के लिए वन विभाग या उच्चाधिकारियों से वैधानिक अनुमति ली गई थी?
कटी हुई लकड़ियों का हिसाब कहां है? उन्हें परिसर के भीतर दफन करने की क्या मजबूरी थी।

क्या शासन के ‘हरित भारत’ अभियान को ठेंगा दिखाने वाले ऐसे अधिकारियों पर कठोर दंडात्मक कार्यवाही होगी

केवलारी का यह घटनाक्रम जिला प्रशासन के लिए एक खुली चुनौती है। यदि इन ‘हरियाली के हत्यारों’ पर तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज कर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो जनता का सिस्टम से भरोसा उठना तय है। अब देखना यह है कि वन विभाग और कलेक्टर महोदय इस ‘पेड़ों के कब्रिस्तान’ पर क्या संज्ञान लेते हैं।

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