जबलपुर। सदर स्थित मोतीलाल नेहरू चिकित्सालय में ओपीडी और अन्य चिकित्सा सेवाओं की फीस में की गई बेतहाशा बढ़ोतरी ने गरीब और जरूरतमंद मरीजों की कमर तोड़कर रख दी है। जिस अस्पताल का उद्देश्य आम जनता—खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग—को सुलभ और सस्ता इलाज मुहैया कराना होना चाहिए, वही अब मुनाफाखोरी का अड्डा बनता नजर आ रहा है।
मानव अधिकार एवं अपराध नियंत्रण संगठन ने इस अन्यायपूर्ण फैसले के खिलाफ जोरदार विरोध दर्ज कराया है। संगठन के अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार वाधवानी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ओपीडी शुल्क को सीधे 50 रुपये तक बढ़ा देना गरीब मरीजों के साथ खुला अन्याय है। इतना ही नहीं, सोनोग्राफी, एक्स-रे और अन्य जांचों की दरों में भी भारी इजाफा कर दिया गया है, जिससे इलाज अब आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकारी अस्पताल अब केवल कागजों में ही “जनता के अस्पताल” रह गए हैं? क्या प्रशासन को उन गरीब परिवारों की पीड़ा दिखाई नहीं देती, जो दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अब इलाज के लिए भी तरसने को मजबूर हैं?
संगठन के पदाधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि एक सप्ताह के भीतर बढ़ाई गई फीस वापस नहीं ली गई, तो वे इस मुद्दे को और उग्र रूप से उठाएंगे। रक्षा मंत्री और कैंट बोर्ड के डायरेक्टर जनरल को ज्ञापन सौंपकर इस जनविरोधी निर्णय के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी जाएगी।
इस विरोध प्रदर्शन में एडवोकेट आशीष त्रिपाठी, एड. भावना निगम, डॉ. अशोक मेठवानी, डॉ. अभिषेक जैन, डॉ. अंकित मिश्रा, एड. रोशन मंध्यानी और एड. अमित खत्री सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा—“स्वास्थ्य सेवाएं कोई व्यापार नहीं, बल्कि जनता का मौलिक अधिकार हैं।”
अब देखना यह है कि प्रशासन जनता के इस आक्रोश को समझता है या फिर गरीबों की पीड़ा को नजरअंदाज कर अपनी मनमानी जारी रखता है।


