जैन धर्म में अक्षय तृतीया का महत्व अत्यंत गहरा और ऐतिहासिक है। इसे ‘वर्षीतप पारणा’ के रूप में भी जाना जाता है। जैन परंपरा में यह दिन केवल एक पर्व नहीं, बल्कि त्याग, संयम और करुणा का प्रतीक है। जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का महत्व मुख्य रूप से साधना, दान, संयम और धर्म प्रचार से जुड़ा है। यह दिन जीवन में अक्षय पुण्य और स्थायी आध्यात्मिक लाभ देने वाला माना जाता
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर, भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) से इस दिन का सीधा संबंध है।
आहार दान की परंपरा का प्रारंभ: भगवान ऋषभदेव ने दीक्षा लेने के बाद 400 दिनों (एक वर्ष से अधिक) तक निराहार रहकर कठिन तपस्या की थी। वे गोचरी (भोजन) के लिए निकलते थे, लेकिन उस समय के लोगों को मुनि को आहार देने की विधि ज्ञात नहीं थी।
इक्षु (गन्ने) का रस: जब भगवान ऋषभदेव हस्तिनापुर पहुंचे, तो वहां के राजा श्रेयांस कुमार (जो उनके प्रपौत्र थे) को अपने पूर्व जन्म का ज्ञान हुआ। उन्होंने भगवान को विधिपूर्वक गन्ने का रस/ इक्षु रस का दान किया। इस तरह भगवान ऋषभदेव का प्रथम आहार प्राप्त हुआ।
पारणा का दिन: जिस दिन भगवान ऋषभदेव ने गन्ने के रस से अपना उपवास तोड़ा, वह दिन वैशाख शुक्ल तृतीया था। चूंकि भगवान का तप ‘अक्षय’ यानी कभी न खत्म होने वाला पुण्य) था और इसी दिन आहार दान की विधि शुरू हुई, इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहा गया।
जैन धर्म में इस दिन का विशेष महत्व
- दान तीर्थ की स्थापना
जैन मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन से संसार में ‘दान तीर्थ’ की शुरुआत हुई। मुनिराज को आहार देने की सही विधि या नवधा भक्ति पहली बार इसी दिन राजा श्रेयांस ने अपनाई थी। इसीलिए जैन धर्म में इस दिन दान देने का अनंत फल माना जाता है।
- वर्षीतप का पारणा
जैन समुदाय में ‘वर्षीतप’ नामक एक कठिन तपस्या की जाती है, जिसमें एक दिन उपवास और एक दिन ‘बेयणा’ यानी भोजन किया जाता है। यह तपस्या एक साल तक चलती है। इस कठिन तप का समापन/ पारणा हमेशा अक्षय तृतीया के दिन गन्ने के रस से किया जाता है। हस्तिनापुर और पालीताना-शत्रुंजय तीर्थ में इस दिन हज़ारों लोग एक साथ पारणा करते हैं।
- त्याग और संयम का संदेश
जैन परंपरा में यह दिन सिखाता है कि जिस प्रकार भगवान ऋषभदेव ने लंबे समय तक कष्ट सहकर संयम रखा, उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में भौतिक सुखों के बजाय आत्मिक सुख पर ध्यान देना चाहिए।
- हस्तिनापुर तीर्थ का महत्व
चूंकि भगवान का पारणा हस्तिनापुर में हुआ था, इसलिए जैन धर्मावलंबियों के लिए हस्तिनापुर इस दिन सबसे बड़ा केंद्र बन जाता है। यहां गन्ने के रस का प्रमुखता से दान किया जाता है।
इस दिन क्या करते हैं जैन धर्मावलंबी?
गन्ने के रस का वितरण: इस दिन गन्ने के रस का स्वयं सेवन करना और दूसरों को पिलाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
आदिनाथ भगवान की पूजा: मंदिरों में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का विशेष अभिषेक और पूजन किया जाता है।
तपस्वियों का सम्मान: जो लोग साल भर का वर्षीतप पूर्ण करते हैं, उनका भव्य जुलूस निकाला जाता है और उन्हें गौरव के साथ पारणा कराया जाता है।
दान और तप: जहां हिन्दू परंपरा में अक्षय तृतीया मुख्य रूप से ‘खरीदारी’ (सोना-चांदी) से जुड़ गई है, वहीं जैन परंपरा में इसका मूल ‘दान और तप’ में समाहित है। यह दिन याद दिलाता है कि संचय करने से ज्यादा आनंद ‘देने’ अर्थात् दान में है।


