जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय एक बार फिर गंभीर आरोपों के कारण चर्चा में है। इस बार मामला विश्वविद्यालय के प्रभावशाली कर्मचारी नेता वंशबहोर पटेल से जुड़ा है, जिनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने की शिकायत पर लोकायुक्त संगठन की विशेष पुलिस स्थापना ने जांच प्रारंभ कर दी है। प्रकरण को E-315/2024 के रूप में दर्ज किया गया है और जांच शुरू होते ही विश्वविद्यालय परिसर में हलचल का माहौल बन गया है।
लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक, जबलपुर संभाग द्वारा विश्वविद्यालय के कुलसचिव को पत्र भेजकर पटेल की पूरी सेवा अवधि के दौरान अर्जित आय का विस्तृत विवरण मांगा गया है। जांच एजेंसी ने वर्ष 1985 से 1994 तक दैनिक वेतनभोगी के रूप में प्राप्त आय तथा वर्ष 1994 से अब तक नियमित वेतन का वर्षवार ब्यौरा उपलब्ध कराने को कहा है। इसके साथ ही जीपीएफ पार्ट फाइनल और अन्य वित्तीय आहरण की जानकारी भी मांगी गई है। बताया जा रहा है कि विश्वविद्यालय द्वारा पहले भेजी गई जानकारी को त्रुटिपूर्ण मानते हुए उसे अस्वीकार कर दिया गया और निर्धारित प्रारूप में दोबारा विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
वंशबहोर पटेल, जो 11 बार कर्मचारी संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं, लंबे समय से विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था में प्रभावशाली माने जाते हैं। उनके खिलाफ केवल आय से अधिक संपत्ति का मामला ही नहीं, बल्कि भर्ती प्रक्रियाओं में अनियमितता, उपकरणों की खरीद में कथित गड़बड़ी, दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण में नियमों की अनदेखी और तकनीकी कर्मचारियों को शिक्षकीय वेतनमान दिलाने जैसे मामलों में भी संलिप्तता के आरोप लगे हैं। शिकायत में यह भी कहा गया है कि इन कथित अनियमितताओं के माध्यम से उन्होंने जबलपुर में तीन मकान, कई एकड़ कृषि भूमि तथा चारपहिया और दोपहिया वाहनों का बड़ा जखीरा तैयार किया।
लोकायुक्त पुलिस द्वारा मांगी गई विस्तृत और वर्षवार जानकारी से यह संकेत मिल रहा है कि जांच को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है और आय तथा संपत्ति के बीच अंतर का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाएगा। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला आपराधिक कार्रवाई की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक महत्वपूर्ण पहलू वंशबहोर पटेल की आगामी सेवानिवृत्ति भी है, जो इस वर्ष सितंबर में प्रस्तावित है। जांच लंबित रहने की स्थिति में विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने उन्हें नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट जारी करने को लेकर असमंजस की स्थिति बन सकती है। नियमों के अनुसार, किसी भी कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के समय एनओसी आवश्यक होती है, लेकिन यदि उस पर भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता की जांच चल रही हो, तो यह प्रक्रिया जटिल हो जाती है।
ऐसी स्थिति में सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य वित्तीय लाभों पर भी असर पड़ सकता है और भुगतान में देरी या रोक की संभावना बन सकती है। इस पूरे मामले ने एक बार फिर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की प्रशासनिक पारदर्शिता और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की नजरें लोकायुक्त जांच की दिशा और उसके अंतिम निष्कर्ष पर टिकी हुई हैं, जो आने वाले समय में विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढांचे पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।


