May 15, 2026
सी टाइम्स
राष्ट्रीय

विश्व थैलेसीमिया दिवस: थकान, कमजोरी और खून की कमी, जेनेटिक डिसऑर्डर की समय पर पहचान जरूरी



नई दिल्ली, 7 मई । बार-बार थकान महसूस होना, कमजोरी आना और शरीर में खून की कमी जैसे लक्षण कई बार गंभीर रक्त संबंधित बीमारी का संकेत हो सकते हैं। इन लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है। रक्त संबंधित आनुवंशिक विकार थैलेसीमिया की समय पर पहचान और जागरूकता बेहद जरूरी है। हर साल 8 मई को विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाया जाता है। 

इस दिन थैलेसीमिया रोग के बारे में जागरूकता फैलाने, मरीजों को सहयोग देने और उनके दैनिक संघर्षों को सम्मान देने का प्रयास किया जाता है। नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) के अनुसार, थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। इससे व्यक्ति को लगातार खून की कमी, थकान और कमजोरी का सामना करना पड़ता है।

थैलेसीमिया मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है- थैलेसीमिया माइनर जिसमें व्यक्ति रोग का वाहक होता है, लेकिन आमतौर पर सामान्य जीवन जी सकता है। अक्सर इसके लक्षण हल्के होते हैं या दिखाई नहीं देते। वहीं, थैलेसीमिया मेजर रोग का गंभीर रूप है। इसमें मरीज को बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है। नियमित चिकित्सकीय देखभाल, दवाओं और विशेष उपचार के बिना जीवन मुश्किल हो जाता है।

विश्व थैलेसीमिया दिवस का मुख्य उद्देश्य युवाओं को शादी से पहले थैलेसीमिया जांच कराने के लिए प्रेरित करना है। अगर दोनों पार्टनर थैलेसीमिया माइनर के वाहक हैं तो उनके बच्चे को थैलेसीमिया मेजर होने की संभावना बढ़ जाती है। समय पर जांच से इस समस्या को रोका जा सकता है।

ऐसे में एक्सपर्ट अपील करते हैं कि थकान, कमजोरी, पीली त्वचा, भूख न लगना या बार-बार बीमार पड़ना जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं। समय पर सही जानकारी और जागरूकता से थैलेसीमिया के प्रभावों और जटिलताओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

थैलेसीमिया मेजर के मरीजों को नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत होती है, इसलिए स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देना भी इस दिवस का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। एक यूनिट रक्त कई मरीजों की जिंदगी बचाने में मदद कर सकता है। जागरूकता ही समाधान है।

थैलेसीमिया पूरी तरह ठीक नहीं हो सकता, लेकिन सही समय पर पहचान, नियमित उपचार और उचित देखभाल से मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि परिवारों को खासकर शादी योग्य उम्र के युवाओं को इस बीमारी के बारे में जानकारी होनी चाहिए।

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