है45 डिग्री की सड़क पर रोज़ी कमाता आदमी आखिर किस सरकार का नागरिक है?
जबलपुर की गर्मी अब मौसम नहीं रही, यह व्यवस्था की नंगी परीक्षा बन चुकी है। तापमान 42 से 45 डिग्री के आसपास मंडरा रहा है, मौसम विभाग की चेतावनियां हीटवेव का संकेत दे रही हैं और शहर की सड़कें दोपहर में ऐसी तप रही हैं जैसे डामर नहीं, अंगारे बिछे हों। वर्तमान मौसम पूर्वानुमान में भी जबलपुर के लिए बेहद गर्म दिन दर्ज हैं, वहीं IMD ने मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में हीटवेव की चेतावनी जारी की है।
लेकिन सवाल मौसम का नहीं है। सवाल यह है कि इस जलते हुए शहर में किसकी जिंदगी की कीमत है और किसकी मजबूरी को नियति मान लिया गया है?
क्योंकि जब शहर की सड़क आग उगल रही होती है, तब कोई फल वाला उसी सड़क के किनारे गीले बोरे और अखबार के सहारे अपनी रेहड़ी बचा रहा होता है। कोई मजदूर सिर पर गमछा बांधकर सीमेंट, ईंट और सरिया ढो रहा होता है। कोई निर्माण मजदूर आधी बनी इमारत की छत पर बिना छांव, बिना पानी, बिना सुरक्षा के खड़ा होता है। कोई निगम कर्मचारी कचरे, धूल और बदबू के बीच शहर को साफ रखने की कोशिश कर रहा होता है। कोई बेघर आदमी पुलिया के नीचे या दुकान की बंद शटर के पास छाया तलाश रहा होता है। कोई पुलिसकर्मी मंत्री के काफिले के लिए सड़क खाली कराने की ड्यूटी में तपते चौराहे पर खड़ा होता है।
और उसी शहर में दूसरी तरफ सत्ता के काफिले एसी गाड़ियों में निकलते हैं। शीशे बंद, गाड़ी ठंडी, सड़क खाली। बाहर जनता जलती है, अंदर व्यवस्था मुस्कुराती है।
यह सिर्फ गर्मी नहीं है, यह सामाजिक अन्याय का तापमान है।
शहर में कागजों पर योजनाएं बहुत हैं। दावे बहुत हैं। बैठकें बहुत हैं। निर्देश बहुत हैं। लेकिन सड़क पर आदमी को क्या मिला? न हर प्रमुख चौराहे पर छांव, न ट्रैफिक सिग्नल पर ग्रीन शेड, न पर्याप्त प्याऊ, न राहगीरों के लिए कूलिंग पॉइंट, न मजदूरों के लिए दोपहर में काम रोकने की प्रभावी व्यवस्था, न खुले में काम करने वालों के लिए ORS-पानी की नियमित व्यवस्था। दावा कागज पर है, नागरिक धूप में है।
जबलपुर के कई हिस्सों में कचरा सड़क पर पड़ा दिखता है, नालियों से बदबू आती है, धूल उड़ती है और उसी माहौल में रोज कमाने वाला आदमी अपनी दुकान, ठेला, औजार या झाड़ू लेकर खड़ा रहता है। शहर का गरीब आदमी दोपहर में आराम नहीं कर सकता, क्योंकि उसके लिए आराम का मतलब है शाम को खाली चूल्हा। वह हीटवेव की एडवाइजरी नहीं पढ़ता, वह पेट की एडवाइजरी मानता है।
सबसे बड़ी विडंबना यही है कि सरकारें आम आदमी से ही उम्मीद करती हैं कि वह अपनी व्यवस्था खुद करे। पानी खुद रखे। छांव खुद खोजे। बीमारी खुद झेले। धूप खुद सहन करे। और जब हालत बिगड़ जाए तो अस्पताल खुद पहुंचे। फिर कहा जाएग “सावधानी रखें, धूप में न निकलें।” यह वाक्य उस आदमी के लिए अपमान जैसा है, जो धूप में निकले बिना अपने बच्चों के लिए रोटी नहीं खरीद सकता।
यह शहर केवल मनुष्यों के लिए नहीं जल रहा। तालाब उबलती थालियों जैसे दिखने लगे हैं। जलजीव बेचैन हैं। मछलियों के लिए पानी भी राहत नहीं रहा। सड़क पर घूमते पशु छांव और पानी के लिए भटक रहे हैं। जिनके पास आवाज नहीं, उनकी पीड़ा तो आंकड़ों में भी दर्ज नहीं होती। क्या शहर की गर्मी केवल मनुष्यों का संकट है? नहीं, यह पूरे जीव-जगत पर प्रशासनिक असावधानी का हमला है।
आज जरूरत भाषणों की नहीं, आपात व्यवस्था की है।
नगर निगम और प्रशासन को हर प्रमुख बाजार, बस स्टैंड, अस्पताल, अदालत, मंडी, मजदूर चौक और ट्रैफिक सिग्नल पर तत्काल प्याऊ, छाया, ORS और प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था करनी चाहिए। निर्माण स्थलों पर दोपहर के समय काम रोकने के निर्देश सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर लागू होने चाहिए। ठेले वालों, सफाई कर्मियों, डिलीवरी कर्मियों, पुलिसकर्मियों और दिहाड़ी मजदूरों के लिए मोबाइल वाटर सपोर्ट और रेस्ट पॉइंट बनाए जाने चाहिए। पशुओं के लिए पानी के टांके, तालाबों की निगरानी और जल संरक्षण की तात्कालिक व्यवस्था होनी चाहिए।
और सबसे जरूरी सत्ता को यह समझना होगा कि शहर केवल उन्हीं लोगों से नहीं चलता जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर आदेश जारी करते हैं। शहर असल में उन हाथों से चलता है जो धूप में जलते हैं। वही मजदूर दीवार खड़ी करता है। वही सफाईकर्मी सुबह सड़क साफ करता है। वही ठेले वाला फल बेचता है। वही ट्रैफिक पुलिसकर्मी चौराहे पर खड़ा रहता है। वही छोटा दुकानदार शहर की रोजमर्रा की धड़कन बचाए रखता है।
जबलपुर की गर्मी ने इस बार एक कठोर सच सामने रख दिया है इस शहर में सुविधा वर्ग के लिए व्यवस्था है, लेकिन मजबूरी वर्ग के लिए सिर्फ सलाह है।
जब नेता आते हैं तो सड़क खाली कराई जाती है। जब मंत्री आते हैं तो काफिला संभाला जाता है। जब बड़े अफसर निकलते हैं तो प्रोटोकॉल सक्रिय हो जाता है। लेकिन जब दिहाड़ी मजदूर 45 डिग्री में गिरता है, तब कौन सा प्रोटोकॉल सक्रिय होता है? जब ठेले वाले का बच्चा धूप में बैठा पानी मांगता है, तब कौन सी फाइल चलती है? जब निगम कर्मचारी कचरे के बीच तपती दोपहर में काम करता है, तब कौन सा अधिकारी निरीक्षण करने पहुंचता है?
यह शहर जवाब मांग रहा है।
गर्मी प्राकृतिक हो सकती है, लेकिन लापरवाही प्राकृतिक नहीं होती। हीटवेव मौसम की घटना हो सकती है, लेकिन बिना प्याऊ, बिना छांव, बिना राहत व्यवस्था के शहर को छोड़ देना प्रशासनिक असंवेदनशीलता है।
जबलपुर को इस समय बड़े-बड़े दावों की नहीं, सड़क पर उतरती व्यवस्था की जरूरत है। एसी मीटिंग रूम से जारी आदेशों की नहीं, चौराहों पर दिखती राहत की जरूरत है। कागजों पर बने प्लान की नहीं, धूप में खड़े आदमी के माथे पर रखे ठंडे पानी की जरूरत है।
क्योंकि शहर का असली तापमान मौसम विभाग की मशीन नहीं बताती। असली तापमान उस मजदूर की पीठ पर दिखता है, उस फल वाले के चेहरे पर दिखता है, उस पुलिसकर्मी की वर्दी में भीगते पसीने में दिखता है, उस बेघर की सूखी आंखों में दिखता है, और उस पशु की भटकन में दिखता है जिसे इस शहर में इंसानों की तरह ही छांव नहीं मिली।
जबलपुर जल रहा है।
और अगर व्यवस्था अब भी नहीं जागी, तो यह गर्मी सिर्फ मौसम की मार नहीं कहलाएगी यह नागरिकों के प्रति शासन की बेरुखी का दस्तावेज बनेगी।


