जबलपुर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों की सुनवाई के आठवें दिन ओबीसी पक्ष की ओर से विस्तृत बहस हुई। अधिवक्ताओं ने न्यायालय में तर्क दिया कि आरक्षण का आधार जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व है, न कि केवल क्वांटिफाएबल (मात्रात्मक) डेटा। मामले की सुनवाई डिवीजन बेंच के समक्ष हुई और अगली सुनवाई 29 जुलाई के लिए निर्धारित की गई है।
ओबीसी पक्ष की ओर से अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह ने बताया कि वर्ष 1953 में गठित प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग) ने शासन एवं प्रशासन में पिछड़े वर्गों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को रेखांकित करते हुए वर्ष 1955 में ओबीसी को कम से कम 40 प्रतिशत आरक्षण देने की अनुशंसा की थी। बाद में वर्ष 1979 में गठित मंडल आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के एम.आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य फैसले को ध्यान में रखते हुए ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की, जिसे वर्ष 1990 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने लागू किया।
अधिवक्ता शाह ने कहा कि इंद्रा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने एससी, एसटी और ओबीसी के लिए कुल 49.5 प्रतिशत आरक्षण को संवैधानिक माना था तथा विशेष परिस्थितियों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण की संभावना से भी इनकार नहीं किया था। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान में ईडब्ल्यूएस आरक्षण सहित देश और मध्यप्रदेश में कुल 60 प्रतिशत आरक्षण लागू है, इसलिए केवल ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण पर आपत्ति करना न तो संवैधानिक है और न ही न्यायसंगत।
बहस के दौरान संविधान के अनुच्छेद 15(4), 16(4), 330 और 332 का हवाला देते हुए कहा गया कि संविधान में शिक्षा, सरकारी नौकरियों और जनप्रतिनिधित्व में आरक्षण का प्रावधान है, जबकि अधिकतम आरक्षण सीमा का स्पष्ट उल्लेख केवल ईडब्ल्यूएस आरक्षण के संदर्भ में किया गया है। ओबीसी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, विनायक प्रसाद शाह, पुष्पेंद्र कुमार शाह, परमानंद साहू, उदय साहू, आर.जी. वर्मा, अभिलाषा लोधी एवं रामभजन लोधी ने पैरवी की।


