जबलपुर। जिले में रेत खनन को लेकर एक बार फिर सवालों का दौर तेज हो गया है। सितंबर 2025 में पुराने ठेकेदार द्वारा अनुबंध छोड़ने के बाद से अब तक नए ठेकेदार की नियुक्ति नहीं हो सकी है। इस बीच नर्मदा और हिरन नदी से कथित अवैध रेत खनन और आपूर्ति को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चाएं हो रही हैं। स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि आखिर चार बार टेंडर जारी होने के बावजूद ठेकेदार क्यों नहीं मिल पा रहा है और इस स्थिति का लाभ किसे मिल रहा है।
जानकारी के अनुसार, जिले की 42 स्वीकृत रेत खदानों सहित अन्य स्थानों से भी रेत के अवैध उत्खनन और परिवहन की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना वैध ठेकेदार के भी बाजार में रेत की उपलब्धता बनी हुई है, जिससे व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
चार बार टेंडर, फिर भी नहीं मिला नया ठेकेदार
बताया जा रहा है कि खनिज निगम और संबंधित विभाग अब तक चार बार संशोधित ऑफसेट प्राइस पर टेंडर जारी कर चुके हैं, लेकिन किसी एजेंसी ने रुचि नहीं दिखाई। विभागीय स्तर पर इसका कारण यह बताया जा रहा है कि पूर्व ठेकेदार को आर्थिक नुकसान हुआ था, जिसके चलते उसने अनुबंध छोड़ दिया और नए ठेकेदार निवेश करने से बच रहे हैं। हालांकि, इस बीच अवैध खनन की शिकायतें लगातार बढ़ती रही हैं।
अवैध खनन को लेकर उठ रहे सवाल
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि नर्मदा और हिरन नदी से बड़े पैमाने पर रेत निकाली जा रही है, लेकिन उसके स्रोत और वैधता को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। जब इस संबंध में अधिकारियों से जानकारी मांगी जाती है तो अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग जवाब सामने आते हैं। ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि बाजार में पहुंच रही रेत का वास्तविक स्रोत क्या है।
भोपाल से हो रहा टेंडर संचालन
संभागीय मुख्यालय स्तर के अधिकारियों का कहना है कि रेत खदानों के टेंडर की पूरी प्रक्रिया भोपाल स्थित मुख्यालय से संचालित की जा रही है। इसलिए टेंडर से जुड़े निर्णय और जानकारी वहीं से उपलब्ध कराई जा सकती है। स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि वे केवल मुख्यालय के निर्देशों के अनुसार कार्य कर रहे हैं।
कार्रवाई पर भी उठ रहे प्रश्न
अवैध खनन रोकने के लिए समय-समय पर प्रशासन द्वारा कार्रवाई किए जाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन कार्रवाइयों का प्रभाव अपेक्षित नहीं दिख रहा। कुछ लोगों का कहना है कि कार्रवाई से पहले ही संबंधित लोगों को सूचना मिल जाती है, जिससे मौके पर केवल सीमित स्तर की जब्ती होती है और बड़े नेटवर्क तक कार्रवाई नहीं पहुंच पाती।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित विभाग ने भी कथित मिलीभगत के आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी नहीं की है। ऐसे में यह मामला जांच और प्रशासनिक स्पष्टता का विषय बना हुआ है।


