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September 20, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

हिन्दी दिवस पर विशे

चलिए आज हम सब भारतवासी फिर से हिन्दी दिवस मनाते हैं*
अनूपपुर । आज फिर हम सब हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी राष्ट्रीय हिन्दी दिवस पर पूरे  देश में दिखावा रूपी  विशेष कार्यक्रम आयोजित कर  दिलो-दिमाग में अंग्रेजी भाषा के प्रेम में लिप्त होकर हिन्दी भाषा अपनाने का झूंठा स्वांग करते हैं,देश की आजादी के बाद से ही १४ सितंबर १९५३ से देश में “राष्ट्रीय हिन्दी दिवस ” मनाने का दौर शुरू होता है, और आज ७९ वर्ष के स्वतंत्र आधुनिक भारत में हिन्दी की प्रगति व विकास को वर्तमान समय की स्थिति से ही सरल व सहज रूप में ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज हिन्दी किस तरह बेबसी की राह पर खड़ी है,। इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि अपने ही देश में हिंदी आज तक देश की राष्ट्रभाषा न बन पाई। दुनिया के किसी भी देश की भाषा व संस्कृति उस देश की पहचान होती है,और हिंदी तो हमारे भारत माता की माथे की बिंदी है।

आज फिर वो राष्ट्रीय हिन्दी दिवस १४ सितंबर की वो शुभ घड़ी आ ही गई , जहां आज हम फिर एक बार पूरे देश में हर  जगह, सभी संस्थाओं में  हिंदी दिवस के शुभ अवसर पर हिन्दी दिवस मनायेंगे,,सभी शासकीय व अशासकीय संस्थानों में, ख़ासकर शैक्षिक संस्थानों में तो इस बार फिर बड़े बड़े  सेमिनार , बेबिनार , निबंध लेखन, प्रतियोगिता व व्याख्यानों के द्वारा दिल में अंग्रेजी के प्रति समेकित प्रेम ,प्यार व व्यापक व्याकुलता रखते हुये व हिंदी दिवस में अपनी मातृभाषा हिंदी के प्रति औपचारिकता निभाते हुए हिन्दी के प्रति पाखंड रूपी प्रेम दिखायेंगे।।  शासन , प्रशासन से लेकर हर अनिवार्यत: स्थानों में खूब अपनी मातृभाषा के विषय में उपदेश दिये जाएंगे,।
बड़े बड़े लेख लिखे जायेंगे, लंबे लंबे भाषणों के माध्यम से कहा जायेगा कि संविधान सभा ने लंबी चर्चा के बाद १४ सितंबर १९४९ को हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया,, भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३४३ से ३५१ तक इसके लिये निर्देशित करता है।हमें अपने देश के हर क्षेत्र में हिंदी को बढ़ावा देने के लिये कार्य करने चाहिए, शिक्षा हो,अदालत हो बैंक हो मेडिकल की पढ़ाई हो या रेलवे हो आदि सभी क्षेत्रों में हिंदी को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
पर सच में क्या ऐसा होता है शायद नहीं,
गंभीर होकर कोई भी जमीनी स्तर पर  कार्य करना नहीं चाहता,बस झूठे उपदेशों के सहारे हिन्दी को वो सम्मान व प्रतिष्ठा दिलाने का प्रोपेगैंडा दिवसों के बहाने  करते चले जा रहें हैं ,!!दिवसों के चक्कर मे हम ऐसे उलझ गए हैं कि बस दिवस की औपचारिकता पूरी करके अगले ही दिन फिर वही पुराने ढर्रे पर चलना शुरू कर देते हैं।
ऐसे में देश के पूर्व उपराष्ट्रपति माननीय एम.वैंकैया नायडू  पंक्ति मुझे याद आती है”यदि किसी देश की संस्कृति व उसके संस्कारों को गहराई से जानना है, तो उसके लिए उसकी व उस देश की भाषा को जानना जरूरी है” ।
मुझे लगता है दुनिया का एक मात्र भारत ऐसा देश है जो विदेशी भाषा अंग्रेजी बोलने पर सम्मानित व गौरवान्वित महसूस करता है, और अंग्रेजी के लिए वह ज्यादा से ज्यादा समय देकर और  ज्यादा पैसे  खर्च करने को तैयार रहता है, और अपने देश की प्रतिभा व प्रभावशाली हिंदी भाषा को वह फ्री में भी स्वीकार करने से परहेज़ करता है,।
स्वतंत्रता के पश्चात से ही हिंदी को बढ़ावा देने का झूठा प्रोपेगैंडा चलता रहा है,।और आज  भी अनवरत रूप से चल रहा है।
आज तो हम इस अंग्रेजी रूपी विदेशी भाषा के प्रति इतने मोहित और आकर्षित गए हैं ,  कि इसकी बेड़ियों में जकड़कर अपनी ही मातृभाषा  हिंदी को दोयम दर्जे की भाषा बना डालें हैं।
लार्ड मैकाले का वो कथन शत् प्रतिशत चरितार्थ हो रहा है , उस समय के भारत के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के काल में अंग्रेजी शिक्षा के प्रबल व कट्टर समर्थक लार्ड मैकाले ने उन्नीसवीं सदी में कहा था कि””हम भारत को छोड़ कर तो चले ही जायेंगे, लेकिन हम एक ऐसी अंग्रेजी रूपी नागिन छोड़कर जायेंगें जो भारतीय भाषा ,कला व संस्कृति को नष्टप्राय कर देगी।
शायद आज ये सच भी होता जा रहा है।
इसके बावजूद हम सब अंग्रेजी के पीछे ही भाग रहें हैं, आज हर अभिभावक को अपने बच्चों कें लिये अंग्रेजी मीडियम स्कूल चाहिए, महाविद्यालय व विश्वविद्यालय चाहिये,फिर हिंदी कहां जायेगी साहब, हिंदी कौन पढ़ेगा मेरे भाई?
अंतर्राष्ट्रीय मंच से हिंदी में संबोधन देश के पूर्व प्रधानमंत्री मानवीय अटल जी ने दिया था। जिसे हम सब जनरल नालेज में पढ़ते हैं ,कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ी को यह पढ़ना पड़े कि अंतरराष्ट्रीय  स्तर पर हिंदी भाषा में संबोधन भारत के कितने प्रधानमंत्रियों नें किया था।
बेशक हम विदेशी भाषाई रूप में तो हम खूब धनीं हैं और संपन्न हैं , लेकिन आज भी हम स्वदेशी भाषा के प्रति बहुत ही गरीब व विपन्न हैं।
मातृभाषा हिंदी सिर्फ संवाद का स्वाभाविक माध्यम ही नहीं है, अपितु  वह तो उस देश की सांस्कृतिक विरासत होती है , और उसकी पहचान होती है.। मातृभाषा ही उस देश की संस्कृति व सभ्यता की वाहक होती है।
इसलिए सरकार को ही सबसे पहले आगे आकर जमीनी स्तर पर नीतियां बनाकर प्रोत्साहित करना होगा, ये बात भी सही है कि वर्तमान सरकार ने हिंदी भाषा को बढ़ावा देने का प्रयास किया ,लेकिन जमीनी स्तर पर उसका पालन भी करना होगा।
हालांकि सभी भाषाओं के प्रति हमारा पूरा आदर व सम्मान है.हमारा देश सदैव “”अनेकता में एकता, राष्ट्र की विशेषता “” से परिपूर्ण रहा है  और बहुभाषा वादी रहा है ,
लेकिन हिंदी तो अपने ही देश में , अपने ही घर में अकेली पड़ गई है , लेकिन हमारे देश की मातृभाषा हिंदी है उसे पहली प्राथमिकता के साथ साथ उसे पूरा सम्मान भी देना होगा.तभी हिंदी दिवस का सही मतलब होगा।बाकी फिर बाद में जरूरत के हिसाब से अन्य भाषाओं में को स्थान दें।
अगर आज भी सरकार इस पर गंभीरता से काम करना शुरु नहीं किया तो निश्चित ही हमारी सांस्कृतिक विरासत अत्यंत ही खतरे में पड़ जायेगी। क्योंकि किसी भी देश की संस्कृति, सभ्यता व संस्कार उस देश की भाषा में ही समाहित होते हैं,।
संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने भी विश्व की आधी से अधिक भाषाओं के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर की थी ।
शताब्दी के अंत तक कई  भाषायें विलुप्त हो जायेंगी।मेरा सदैव मानना रहा है कि शासन व प्रशासन के विभिन्न क्षेत्रों में मातृभाषा हिंदी को अधिकाधिक प्रयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
यदि ऐसा न हुआ तो  हम सब राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय हिंदी दिवस ही मनाते रह जायेंगे।और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
     मनोज दुबे ( लेखक व चिंतक )
            वेंकटनगर

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