सत्ता भी सड़क पर, विपक्ष भी सड़क पर लोकतंत्र का रक्षक आखिर कौन और उसका भक्षक कौन? इस राजनीतिक शोर में आम आदमी की आवाज आखिर कहां खो गई?
भारतीय राजनीति का मौजूदा दृश्य अपने आप में एक बड़ा विरोधाभास है। देश में लोकतंत्र को बचाने की ऐसी होड़ मची है कि सत्ता पक्ष भी सड़क पर है और विपक्ष भी सड़क पर। एक तरफ भाजपा ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ का नारा बुलंद कर रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस और इंडिया गठबंधन ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ की आवाज के साथ लोकतंत्र बचाने के लिए मैदान में हैं। दोनों के हाथों में लोकतंत्र का झंडा है, दोनों के भाषणों में संविधान की चिंता है और दोनों ही खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रक्षक बताने में लगे हैं। मगर इस पूरी कवायद के बीच देश की जनता एक सीधा-सा सवाल पूछ रही है, जब लोकतंत्र को बचाने वाले दोनों ही मोर्चों पर खड़े हैं, तो फिर लोकतंत्र को खतरा आखिर किससे है?
विडंबना देखिए, सवाल उठता है कि आजादी के बाद से देश चला कौन रहा था? लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की जिम्मेदारी किसकी थी? और अगर आज लोकतंत्र पर संकट है, तो इसकी जवाबदेही कौन लेगा?
लोकतंत्र किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं है कि जब चाहे कोई उसके संरक्षण का दावा कर दे। यह संविधान से संचालित व्यवस्था है, जिसमें सत्ता की जिम्मेदारी शासन करना और विपक्ष की जिम्मेदारी सरकार को जवाबदेह बनाना है।
सत्ता पक्ष का काम केवल विपक्ष की गलतियां गिनाना नहीं, बल्कि अपने शासन की उपलब्धियों और कमियों दोनों का हिसाब देना है। विपक्ष का काम केवल सरकार को घेरना नहीं, बल्कि जनता को यह बताना भी है कि सत्ता मिलने पर वह क्या अलग करेगा।
लेकिन हमारे राजनीतिक विमर्श में अब सवालों से ज्यादा आरोपों की गूंज सुनाई देती है। सत्ता विपक्ष को अराजकता का प्रतीक बताती है और विपक्ष सत्ता पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगाता है। हर कोई दूसरे को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहा है, लेकिन अपने आचरण की समीक्षा करने को शायद ही कोई तैयार दिखाई देता है।
सवाल यह नहीं कि कौन लोकतंत्र बचाने के लिए कितनी लंबी पदयात्रा निकाल रहा है या किसकी रैली में कितनी भीड़ जुट रही है। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल अपने भीतर लोकतंत्र का पालन कर रहे हैं? क्या वे अपने कार्यकर्ताओं और असहमत आवाजों को सम्मान देते हैं? क्या वे जनता के प्रति उतने ही जवाबदेह हैं, जितना जवाबदेह होने की मांग वे अपने विरोधियों से करते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि लोकतंत्र की रक्षा का यह शोर दरअसल राजनीतिक अस्तित्व बचाने और सत्ता की कुर्सी सुरक्षित रखने की जद्दोजहद बनता जा रहा है?
राजनीतिक मंचों पर लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं, लेकिन आम आदमी का लोकतंत्र रोजमर्रा की परेशानियों में उलझा हुआ है। एक युवा हाथ में डिग्री लेकर नौकरी के लिए भटक रहा है। किसान खेत में पसीना बहाने के बाद भी अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। मजदूर दिनभर मेहनत करके भी परिवार की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा। मध्यमवर्गीय परिवार की आमदनी का बड़ा हिस्सा बच्चों की फीस, मकान के किराये, बिजली के बिल और रसोई के खर्च में निकल जाता है। गरीब आदमी के लिए बीमारी आज भी कई बार जिंदगी भर की जमा-पूंजी खत्म कर देती है।ऊपर से भ्रष्टाचार का ऐसा जाल है कि सामान्य काम कराने के लिए भी लोगों को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। सरकारी योजनाओं की घोषणाएं होती हैं, लेकिन लाभ पाने के लिए आम नागरिक को प्रक्रिया, कागजी कार्रवाई और कभी-कभी बिचौलियों से जूझना पड़ता है। सुशासन के दावे सुनाई देते हैं, मगर आम आदमी को व्यवस्था में जवाबदेही और संवेदनशीलता की तलाश बनी रहती है। यह कैसी व्यवस्था है, जहां नागरिक अपने ही अधिकारों के लिए संघर्ष करता है? जहां सरकारी दफ्तर में काम कराने के लिए सिफारिश की जरूरत पड़ती है? जहां न्याय पाने की प्रक्रिया वर्षों तक चल सकती है और जहां गरीब के लिए इलाज भी आर्थिक चुनौती बन जाता है? क्या इन समस्याओं पर भी सत्ता और विपक्ष उसी गंभीरता से सड़क पर उतरेंगे, जिस गंभीरता से लोकतंत्र बचाने के लिए उतर रहे हैं? या फिर ये मुद्दे केवल चुनावी घोषणा पत्रों और भाषणों की शोभा बढ़ाने के लिए ही रह गए हैं?
इस राजनीतिक तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वह है जनता की अपनी जिम्मेदारी। हर चुनाव में जनता के पास सत्ता से हिसाब मांगने का अवसर आता है। लेकिन क्या हम उस अवसर का इस्तेमाल अपने जीवन से जुड़े वास्तविक मुद्दों के आधार पर करते हैं? हम अपने पसंदीदा नेता की हर बात का बचाव करने लगते हैं। उसकी विफलता पर भी तर्क ढूंढ़ लेते हैं और विरोधी की छोटी-सी गलती को सबसे बड़ा मुद्दा बना देते हैं।
यहीं लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी पैदा होती है। जिस दिन मतदाता सवाल पूछना छोड़ देता है, उसी दिन जनप्रतिनिधि जवाबदेही से बचने का रास्ता तलाशने लगता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि जनता की गलत पसंद के नाम पर राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी से बच निकलें। जनता को जागरूक बनाना, उसे सही जानकारी देना और उसके सामने बेहतर विकल्प रखना भी राजनीतिक व्यवस्था का दायित्व है।लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। यह असहमति को जगह देने, संस्थाओं को स्वतंत्र रखने, नागरिक अधिकारों की रक्षा करने और सत्ता को जवाबदेह बनाने की व्यवस्था है। सत्ता को यह साबित करना होगा कि वह आलोचना से डरती नहीं, बल्कि सवालों का जवाब देने का साहस रखती है। विपक्ष को यह साबित करना होगा कि वह केवल सत्ता विरोध की राजनीति नहीं करता, बल्कि जनता के लिए ठोस वैकल्पिक नीतियां भी रखता है।
मीडिया को भी आत्ममंथन करना होगा। क्या उसकी प्राथमिकता जनता के सवाल हैं या राजनीतिक दलों के आरोपों को दिनभर दोहराना? क्या वह सत्ता से उतने ही तीखे सवाल पूछता है, जितने विपक्ष से पूछता है? लोकतंत्र में मीडिया का काम किसी राजनीतिक खेमे की आवाज बनना नहीं, बल्कि जनता की आवाज बनना है।संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता भी किसी लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। किसी भी संस्था पर सवाल उठे तो उसका जवाब पारदर्शिता और तथ्यों से आना चाहिए, राजनीतिक आरोपों से नहीं। लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन जनता के सवाल स्थायी होते हैं।
देश को ऐसी राजनीति नहीं चाहिए, जिसमें लोकतंत्र का नाम तो हर भाषण में हो, लेकिन आम आदमी की जिंदगी का सवाल हर बार पीछे छूट जाए। देश को ऐसी राजनीति चाहिए जिसमें सत्ता का मतलब सेवा, विपक्ष का मतलब जिम्मेदार निगरानी और चुनाव का मतलब जनता के प्रति जवाबदेही हो।क्योंकि लोकतंत्र की असली हालत किसी रैली की भीड़, किसी पदयात्रा की लंबाई या किसी नारे की ऊंचाई से नहीं मापी जाती। उसकी असली हालत उस गरीब के चेहरे पर दिखाई देती है जिसे समय पर इलाज नहीं मिलता, उस युवा की आंखों में दिखाई देती है जिसे डिग्री के बाद नौकरी नहीं मिलती, उस किसान की चिंता में दिखाई देती है जिसे अपनी फसल का उचित दाम नहीं मिलता और उस नागरिक के अनुभव में दिखाई देती है जिसे अपना जायज काम कराने के लिए भी व्यवस्था से लड़ना पड़ता है।
लोकतंत्र बचाने की लड़ाई तब तक अधूरी है, जब तक आम आदमी की जिंदगी में न्याय, रोजगार, सम्मान और सुशासन दिखाई नहीं देता।


