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June 16, 2026
सी टाइम्स
अंतरराष्ट्रीय

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार के खिलाफ अभिया तेज

लंदन, 9 जुलाई | हाल ही में अश्वेत अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस द्वारा निर्मम हत्या के विरोध में अमेरिका सहित विश्व भर में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। अब बांग्लादेश और ब्रिटेन में एक और विरोध-अभियान शुरू हो गया है, जिसके लिए एक नारा (स्लोगन) दिया गया है, ‘बांग्लादेश : हिंदू जीवन मायने रखता है! धार्मिक अल्पसंख्यक उत्पीड़न बंद करो!’

यह अभियान दो जून को बांग्लादेश के गोपालगंज जिले के अंतर्गत कोटालीपारा में पुलिस द्वारा एक युवा हिंदू व्यक्ति की हत्या के मद्देनजर विशेष रूप से तेज हो रहा है।

ढाका में प्रमुख बांग्ला दैनिक समाचारपत्र ‘प्रथम आलो’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित रामशिल गांव निवासी निखिल तालुकदार (32) तीन अन्य लोगों के साथ ताश खेल रहा था। उसी समय वहां सहायक सब इंस्पेक्टर शमीम उद्दीन पहुंचे और उनकी पिटाई शुरू कर दी।

अन्य तीन लोग तो बचकर निकल गए, लेकिन निखिल नहीं जा सका और पुलिस अधिकारी ने उसकी बेरहमी से पिटाई शुरू कर दी, जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्च र हो गया। इसके बाद उसे बारिसल शेर-ए-बांग्ला मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया और जब उसकी स्थिति बिगड़ने लगी तो उसे ढाका पंगु अस्पताल ले जाया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया।

एक अन्य समाचारपत्र दैनिक समोकल ने उसकी पत्नी इति तालुकदार के हवाले से कहा, “मेरे पति ने कोई अपराध नहीं किया, वह बस ताश खेल रहा था। पुलिस अधिकारी ने उसे इस तरह से अमानवीय तरीके से पीट-पीटकर क्यों मार डाला। मैं पुलिस द्वारा की गई इस हत्या के लिए सजा की मांग करती हूं।”

इति तालुकदार द्वारा की गई न्याय की मांग बांग्लादेश की सीमाओं से परे जा चुकी है और अब हिंदू अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों को समाप्त किए जाने की मांग उठने लगी है।

एक लंदन स्थित संगठन धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश आंदोलन यूके ने अल्पसंख्यक हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ अभियान शुरू किया है। इस सगंठन का नेतृत्व मानवाधिकार कार्यकर्ता पुष्पिता गुप्ता कर रही हैं। वह बांग्लादेशी मूल की एक ब्रिटिश नागरिक हैं, जिन्होंने बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा जारी रखने के मुद्दे के खिलाफ एक अभियान शुरू किया है।

पूरे बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं पर हमले कोई नई घटना नहीं है। यह काफी वर्षों से चल रहा है, खासकर 1975 के बाद राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद हिंदुओं को काफी जुल्म सहना पड़ रहा है।

हालांकि, चिंताजनक बात यह है कि बांग्लादेश के विभिन्न हिस्सों में हिंदू समुदाय के लोगों पर वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भी अत्याचार बढ़ रहे हैं, जिसे अल्पसंख्यक-हितैषी माना जाता है।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ दुष्कर्म, अपहरण, भूमि कब्जाने, मंदिरों को विखंडित करने, जबरन धर्मांतरण जैसे मामले सामने आते रहते हैं और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों द्वारा उन्हें उत्पीड़ित किया जा रहा है। पीड़ित भी पुलिस के सामने मामले दर्ज कराने की हिम्मत तक नहीं कर पाते, क्योंकि पुलिस अक्सर अपराधियों का पक्ष लेती है।

अवैध रूप से और जबरन धार्मिक अल्पसंख्यकों को उनके पैतृक घरों से बेदखल करने, उनके घरों और मंदिरों को जलाने की घटनाएं बांग्लादेश और पाकिस्तान में आए दिन होती रहती हैं। हिंदुओं के खिलाफ इस तरह के अत्याचार लंबे समय से जारी हैं और चिंता की बात यह है कि कोविड-19 संकट के दौरान भी इस तरह के हमले बेरोकटोक हो रहे हैं।

हिंदुओं पर अत्याचार इस कदर है कि लोग भारत और अन्य देशों में जाने के लिए बांग्लादेश छोड़ रहे हैं। इस तथ्य के पीछे एकमात्र कारण यह है कि वे बांग्लादेश में सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं।

धर्मनिरपेक्ष समूह अपनी आवाज बहुत कम उठाते पाते हैं और उनकी आवाज कमजोर भी इसलिए पड़ जाती है, क्योंकि वे इस्लामी समूहों और सत्ता में प्रभावशाली लोगों से प्रतिशोध के बारे में आशंकित रहते हैं।

प्रधानमंत्री शेख हसीना अल्पसंख्यकों के प्रति सहानुभूति रखती हैं और समस्याओं से अवगत भी हैं, लेकिन उनके पार्टी और सरकार में कट्टरपंथी लोगों के होने के कारण इस दिशा में कोई सुधार नहीं हो पा रहा है।

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