कोलकाता, 7 जुलाई। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में पिछले साल अगस्त में हुए सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले के दोषी सिविक वॉलंटियर संजय रॉय जेल में लगातार अनुशासनहीनता और आदेशों की अवहेलना के कारण अब नए संकट में फंसते दिख रहे हैं। रॉय को पिछले साल ट्रायल कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी और वह वर्तमान में दक्षिण कोलकाता स्थित प्रेसीडेंसी सेंट्रल करेक्शनल होम में सजा काट रहा है।
जेल सूत्रों के मुताबिक, सात महीने से जेल में बंद रॉय ने अब तक कोई पछतावा नहीं दिखाया है। इसके विपरीत, समय के साथ उनकी सह-कैदियों और जेल कर्मचारियों के साथ बदसलूकी तथा नियमों की अनदेखी बढ़ती जा रही है। अधिकारी ने बताया कि स्थिति ऐसे ही रही तो जेल मैनुअल के तहत कार्रवाई करनी पड़ेगी।
शुरुआत में रॉय को जेल परिसर के बगीचे की देखभाल का काम दिया गया था, जो नए कैदियों के लिए अनिवार्य प्रशिक्षण कार्य होता है। पहले उन्होंने नियमों का पालन किया, लेकिन बाद में लगातार नियम तोड़ना और स्टाफ से दुर्व्यवहार शुरू कर दिया। अधिकारी ने बताया कि सजा के तौर पर उनकी जेल में अर्जित मजदूरी से निकासी की स्वतंत्रता रोकी जा सकती है। पैसे खाते में जमा रहेंगे, लेकिन वह उन्हें खर्च नहीं कर सकेंगे।
इस मामले में एडीजी एवं आईजी करेक्शनल सर्विसेज एल.एन. मीणा से संपर्क नहीं हो सका। वहीं, रॉय के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कौशिक गुप्ता ने कहा कि उन्हें इस घटनाक्रम की जानकारी नहीं है, और वह केवल हाईकोर्ट में उनकी बरी होने की याचिका पर पेशी कर रहे हैं।
मनोवैज्ञानिक एवं ग्राफोलॉजिस्ट रजनीता साहा मुखोपाध्याय ने कहा कि रॉय का व्यवहार कई मानसिक कारणों से जुड़ा हो सकता है—जैसे अपराध से इनकार, जिससे निराशा और गुस्सा पैदा होता है; या फिर पश्चाताप की कमी, जो उनकी गिरफ्तारी के बाद कही गई चुनौतीपूर्ण बात “अगर फांसी देनी है तो दे दो” से मेल खाती है।
उन्होंने बताया कि यह कॉग्निटिव डिसोनेंस (विरोधाभासी विश्वासों के कारण मानसिक तनाव) या डिफेंसिवनेस (तनाव और अपराधबोध से बचाव के लिए मनोवैज्ञानिक ढाल) का परिणाम भी हो सकता है, और इसमें एंटीसोशल पर्सनैलिटी ट्रेट्स की झलक मिलती है।
इस बीच, पीड़िता के माता-पिता ने उनकी पहली बरसी पर 9 अगस्त को ‘नबन्ना अभियान’ (राज्य सचिवालय तक मार्च) का आह्वान किया है। 9 अगस्त की सुबह पीड़िता का शव अस्पताल परिसर के सेमिनार हॉल में मिला था। ट्रायल कोर्ट से रॉय को उम्रकैद की सजा मिलने के बावजूद, एक साल बाद भी सीबीआई अपराध में “बड़ी साजिश” की जांच पूरी नहीं कर सकी है।


