जबलपुर में हुई यह हृदयविदारक घटना केवल एक सड़क हादसा नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की सामूहिक असफलता का आईना है। हाईवे किनारे बैठकर भोजन कर रहे मजदूरों को तेज रफ्तार बेलगाम कार द्वारा कुचल दिया जाना यह बताता है कि सड़क सुरक्षा, श्रमिक सुरक्षा और प्रशासनिक सतर्कता—तीनों ही मोर्चों पर हम गंभीर चूक कर रहे हैं।
हादसे में 14 मजदूरों का कुचला जाना, चार की मौत और कई का गंभीर रूप से घायल होना यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर राष्ट्रीय राजमार्गों पर काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? सड़क किनारे काम कर रहे श्रमिकों के लिए न तो पर्याप्त चेतावनी संकेत थे, न बैरिकेडिंग और न ही सुरक्षित विश्राम स्थल। यह लापरवाही जानलेवा साबित हुई।
दूसरी ओर, तेज रफ्तार और लापरवाह वाहन चालक भी इस त्रासदी के प्रमुख दोषी हैं। हाईवे पर गति सीमा का पालन न होना, नशे में वाहन चलाना और कानून का भय समाप्त हो जाना ये सभी कारण ऐसे हादसों को जन्म देते हैं। सवाल यह भी है कि ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस की निगरानी और ट्रैफिक नियंत्रण क्यों नहीं था?
यह घटना श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर भी करारा तमाचा है। रोजी-रोटी की तलाश में आए मजदूर, जो देश के विकास की नींव मजबूत करते हैं, वही सबसे असुरक्षित हैं। न उनके पास स्थायी रोजगार की सुरक्षा है, न स्वास्थ्य बीमा और न ही दुर्घटना से बचाव के ठोस इंतजाम।
समय आ गया है कि हादसे के बाद केवल मुआवजे और बयानबाजी तक सीमित न रहा जाए बल्कि हाईवे पर कार्यरत मजदूरों के लिए अनिवार्य सुरक्षा मानक तत्काल तय किए जाएं।
कार्यस्थल पर बैरिकेडिंग, साइन बोर्ड और फ्लैश लाइट की व्यवस्था हो
संवेदनशील क्षेत्रों में स्पीड कंट्रोल और पुलिस गश्त बढ़े
दोषी वाहन चालकों के खिलाफ कठोर और त्वरित कार्रवाई हो
यदि हर हादसे के बाद हम केवल शोक जताकर आगे बढ़ जाते हैं, तो ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी। यह हादसा चेतावनी है कि अगर अब भी नहीं चेते, तो विकास की सड़क पर इंसानी जानें यूं ही कुचली जाती रहेंगी।


