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June 16, 2026
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मंथन: 5 महिलाओं की मौत का जिम्मेदार कौन? क्या ₹2 लाख में खरीदी जा सकती है मजदूरों की मौत?

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा था कि “सड़कें किसी भी प्रदेश के विकास का आईना होती हैं।” लेकिन जबलपुर-रायपुर फोरलेन पर बरेला के पास जो हृदयविदारक घटना हुई, उसने इस चमकते आईने पर बेगुनाह मजदूरों के खून के धब्बे लगा दिए हैं। दोपहर के भोजन के समय, जब हाथ मेहनत की थकान मिटाने के लिए निवाला उठा रहे थे, तब एक तेज रफ्तार सफेद कार ने 14-15 मजदूरों को रौंद दिया। इस हादसे में अब तक पांच महिलाओं की मौत हो चुकी है, जो न केवल परिवारों की रीढ़ थीं, बल्कि देश के निर्माण में अपना पसीना बहा रही थीं।

यह हादसा केवल एक ‘एक्सीडेंट’ नहीं है, बल्कि यह व्यवस्थागत लापरवाही और मानवीय संवेदनहीनता का एक भयावह उदाहरण है। यहाँ सवाल केवल उस कार चालक का नहीं है जिसने रफ्तार पर नियंत्रण खोया, बल्कि सवाल उस समूचे तंत्र का है जो सड़क पर काम करने वाले इन ‘असंगठित’ नायकों की सुरक्षा को हाशिए पर रखता है।

सुरक्षा मानकों की बलि: हादसे वाली जगह पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं थे? निर्माण कार्य के दौरान क्या ठेकेदार ने उचित बैरिकेडिंग और सांकेतिक बोर्ड लगाए थे? अक्सर देखा जाता है कि बड़ी कंपनियां और ठेकेदार मुनाफे के चक्कर में मजदूरों के बीमा (Insurance) और पीएफ (PF) जैसे नियमों को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। 90 प्रतिशत मामलों में मजदूरों का कोई बीमा नहीं होता। अगर इन मजदूरों की सुरक्षा के लिए ठोस प्रोटोकॉल होता, तो शायद आज पांच घर अनाथ न होते।

मुआवजा या महज रस्म अदायगी? सरकार ने मृतकों के परिवारों के लिए 2-2 लाख रुपये की राहत राशि घोषित की है। लेकिन क्या किसी की जान की कीमत महज दो लाख रुपये हो सकती है? असंगठित क्षेत्र का मजदूर जब मरता है, तो उसके पीछे पूरा परिवार दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। जनभावनाओं और न्याय का तकाजा यह है कि सहायता राशि कम से कम 5 से 10 लाख रुपये हो और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी का प्रावधान मिले, ताकि उनका भविष्य अंधकारमय न हो।

चालक की लापरवाही और लाइसेंस का खेल: वाहन चलाने से पहले खुद पर नियंत्रण होना अनिवार्य है। गति सीमा के नियमों का उल्लंघन आज एक शौक बन गया है। बिना लाइसेंस या अनफिट चालकों को महज कुछ सौ रुपये के जुर्माने पर छोड़ देना, ऐसे हादसों को निमंत्रण देना है। जब तक कठोर दंड और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सड़कों पर ‘रफ्तार का कहर’ मासूमों को लीलता रहेगा।

विकास जरूरी है, लेकिन वह विकास किस काम का जो उन हाथों को ही कुचल दे जो उसे बना रहे हैं? सरकार और प्रशासन को केवल मुआवजा बांटकर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री नहीं कर लेनी चाहिए। ठेकेदार की जवाबदेही, सुरक्षा ऑडिट और सख्त ट्रैफिक नियमों के बिना ‘विकास का आईना’ कभी साफ नहीं दिखेगा। विकास की सड़क पर इंसानियत नहीं कुचली जानी चाहिए।

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