जबलपुर के आधारताल स्थित लिटिल किंगडम सीनियर सेकेंडरी स्कूल में कक्षा 10वीं के परीक्षा परिणामों को लेकर उठे विवाद ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है, क्या आंतरिक मूल्यांकन केवल प्रदर्शन का मापदंड है, या उसमें संस्थागत पारदर्शिता और संवाद की भी उतनी ही अहम भूमिका है?
मामला तब गरमाया जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और कुछ अभिभावकों ने स्कूल प्रशासन पर यह आरोप लगाया कि जिन विद्यार्थियों ने स्कूल द्वारा आयोजित गोवा ट्रिप में हिस्सा नहीं लिया या कुछ सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में शामिल नहीं हो पाए, उन्हें इंटरनल असेसमेंट में अपेक्षाकृत कम अंक दिए गए। आरोपों के अनुसार, 20 अंकों के आंतरिक मूल्यांकन में कुछ विद्यार्थियों को केवल 7, 8 या 10 अंक मिले, जिससे उनके समग्र परिणाम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
विद्यार्थी परिषद के महानगर मंत्री आर्यन पुंज ने यह भी आरोप लगाया कि स्कूल की प्रिंसिपल ने विद्यार्थियों को पहले ही यह चेतावनी दी थी कि यदि वे गोवा ट्रिप पर नहीं जाएंगे, तो उनके अंक प्रभावित हो सकते हैं। यदि यह आरोप सही सिद्ध होता है, तो मामला केवल अंक कटने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता, छात्रों की मनोस्थिति और संस्थागत जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
अभिभावकों और विद्यार्थी संगठनों की चिंता इसलिए भी स्वाभाविक है, क्योंकि दसवीं कक्षा का परिणाम विद्यार्थियों के आत्मविश्वास और आगे की शैक्षणिक दिशा दोनों को प्रभावित करता है। ऐसे में यदि बच्चों को यह महसूस हो कि उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं हुआ, तो उसका असर केवल अंकपत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके मनोबल पर भी पड़ता है।
हालाँकि, इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सीटाइम्स ने स्कूल के चेयरपर्सन से बात की। उन्होंने कहा कि यह विषय उनके संज्ञान में है और विद्यार्थियों तथा अभिभावकों की शिकायतों को गंभीरता से लिया जा रहा है। चेयरपर्सन के अनुसार, प्रैक्टिकल और आंतरिक मूल्यांकन में अंक विद्यार्थियों के प्रदर्शन, व्यवहार और कंडक्ट के आधार पर दिए गए हैं, और सभी छात्रों को एक समान दृष्टि से देखा जाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिस प्रकार के भेदभाव के आरोप लगाए जा रहे हैं, वैसी स्थिति की अभी पुष्टि नहीं हुई है।
स्कूल प्रबंधन ने यह भी बताया कि प्रिंसिपल पर लगे आरोपों की समीक्षा की जा रही है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो उचित कार्रवाई की जाएगी। सूत्रों के मुताबिक, इस स्तर पर प्रिंसिपल को अस्थायी रूप से हटाने या निलंबित करने जैसे विकल्पों पर भी विचार चल रहा है, लेकिन इस संबंध में अंतिम निर्णय जांच के निष्कर्षों के बाद ही लिया जाएगा।
यही वह बिंदु है, जहाँ यह विवाद केवल एक स्कूल या एक बैच का मामला नहीं रह जाता, बल्कि व्यापक रूप से शिक्षा संस्थानों में विश्वास और पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
साथ ही, यह भी उतना ही जरूरी है कि किसी आरोप को जांच पूरी होने से पहले अंतिम सत्य मान लेने की जल्दबाजी न की जाए। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भावनात्मक प्रतिक्रिया से अधिक महत्व तथ्य, प्रक्रिया और निष्पक्ष परीक्षण का होना चाहिए। विद्यार्थियों की शिकायतें गंभीर हैं, इसलिए उनकी अनदेखी नहीं होनी चाहिए, लेकिन स्कूल का पक्ष भी सुना जाना चाहिए, ताकि न्याय संतुलित और विश्वसनीय प्रतीत हो।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्कूल, छात्र और अभिभावक इन तीनों के बीच संवाद में थोड़ी-सी कमी भी बड़े अविश्वास का रूप ले सकती है। इस समय आवश्यकता आरोपों के शोर से अधिक पारदर्शी जांच, लिखित जवाबदेही और संवेदनशील प्रशासनिक हस्तक्षेप की है। यदि विद्यार्थियों के साथ अन्याय हुआ है, तो उन्हें न्याय मिलना चाहिए, और यदि मूल्यांकन नियमानुसार हुआ है, तो स्कूल को भी पूरे तथ्यों के साथ अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से बताने का अवसर मिलना चाहिए।


