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April 27, 2026
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पाकिस्तान में प्रॉपर्टी वैल्यूएशन कटौती से उजागर हुई रियल एस्टेट लॉबी की ताकत, टैक्स सुधारों पर सवाल



नई दिल्ली, 25 अप्रैल  पाकिस्तान के फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (एफबीआर) द्वारा प्रॉपर्टी वैल्यूएशन टेबल में हालिया संशोधन ने एक बार फिर देश में रियल एस्टेट सेक्टर की मजबूत पकड़ और सरकार की प्रभावी टैक्स सुधार लागू करने की सीमित क्षमता को उजागर कर दिया है। यह दावा एक रिपोर्ट में किया गया है।



डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआत में इस कदम को सरकारी जमीन मूल्यों को बाजार दरों के करीब लाने की कोशिश बताया गया था, लेकिन समय के साथ यह फैसला लगातार नरम पड़ता गया। इसमें कई बार बदलाव, स्थगन और रियायतें दी गईं।

संशोधित वैल्यूएशन, खासकर इस्लामाबाद में, 10 से 35 प्रतिशत तक कम कर दिए गए हैं। यह कटौती डेवलपर्स और बिल्डर्स के कड़े विरोध के बाद की गई। इससे पहले बढ़ाए गए मूल्यांकन को भी बाजार कीमतों से काफी कम माना जा रहा था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि घोषित कीमतों और वास्तविक लेनदेन मूल्यों के बीच अंतर कम करने के बजाय ताजा संशोधनों ने इस खाई को और बढ़ा दिया है। इससे कम कीमत दिखाकर सौदे करने, टैक्स चोरी और बिना हिसाब-किताब वाले धन के इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, इन संशोधनों को चुनिंदा इलाकों तक सीमित रखने पर भी सवाल उठे हैं। पूरे देश में पारदर्शी तरीके से पुनर्मूल्यांकन करने के बजाय एफबीआर ने कुछ खास क्षेत्रों में ही बदलाव किए हैं। इससे यह धारणा बनी है कि वैल्यूएशन में बदलाव प्रभावशाली समूहों से बातचीत के बाद किए गए, न कि निष्पक्ष और आंकड़ों पर आधारित प्रक्रिया के तहत।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समस्या की जड़ पाकिस्तान की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में रियल एस्टेट सेक्टर का गहरा दबदबा है। इसे देश के सबसे प्रभावशाली कारोबारी लॉबी में से एक माना जाता है, जिसकी पहुंच राजनीति, नौकरशाही और संस्थागत ढांचे तक है।

सत्ता से जुड़े प्रभावशाली लोगों की हिस्सेदारी के कारण इस क्षेत्र पर प्रभावी टैक्स लगाने की कोशिशों को बार-बार विरोध का सामना करना पड़ा है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रियल एस्टेट पाकिस्तान में बिना टैक्स वाले या अवैध धन को खपाने का पसंदीदा माध्यम बना हुआ है। इससे उत्पादक निवेश की बजाय सट्टेबाजी को बढ़ावा मिलता है।

यह असंतुलन पाकिस्तान के लगातार कम टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात और अप्रत्यक्ष करों पर भारी निर्भरता की बड़ी वजह है, जिसका बोझ आम नागरिकों पर पड़ता है।

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