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जबलपुर। बरगी बांध में 30 अप्रैल की शाम आए तेज तूफान के दौरान हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने 13 लोगों की जान ले ली। जहां कभी सुकून भरा माहौल होता था, वहीं अब सन्नाटे के बीच कई गंभीर सवाल गूंज रहे हैं—क्या यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा थी, या कहीं व्यवस्था की चूक भी जिम्मेदार है?
यह सच है कि तेज आंधी और लगभग 70 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चली हवाओं ने हालात बिगाड़ दिए, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इस हादसे को टाला जा सकता था? क्या सुरक्षा इंतजाम पर्याप्त थे? क्या समय रहते सही निर्णय लिए गए?
इंजन फेल या मौसम का कहर?
हादसे के बाद कई तरह की बातें सामने आई हैं। प्रत्यक्षदर्शियों, खासकर जीवित बचे यात्रियों का दावा है कि क्रूज का इंजन बंद हो गया था, जिससे वह तेज लहरों का सामना नहीं कर पाया। वहीं पर्यटन विभाग के सलाहकार राजेंद्र निगम ने इस दावे से इनकार करते हुए कहा कि दोनों इंजन चालू थे और हादसा अचानक बिगड़े मौसम के कारण हुआ, जिससे लोअर केबिन में पानी भर गया।
मौसम अलर्ट पर भी उठे सवाल
मौसम विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। वैज्ञानिक अरुण शर्मा का कहना है कि विभाग द्वारा सामान्य और येलो अलर्ट जारी किया गया था। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि खराब मौसम की आशंका के बावजूद यात्रियों से भरे क्रूज को पानी में क्यों उतारा गया?
लाइफ जैकेट: अनिवार्यता या लापरवाही?
सबसे अहम सवाल सुरक्षा से जुड़ा है—क्या यात्रियों के लिए लाइफ जैकेट पहनना अनिवार्य था? अधिकारियों के अनुसार क्रूज में यह अनिवार्य नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार सलाह दी जाती है। लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हादसे के वक्त अफरा-तफरी में लोगों ने खुद ही जैकेट निकालकर पहनने की कोशिश की।
20 साल पुराना क्रूज और बीमा पर सवाल
बताया जा रहा है कि यह क्रूज 2005-06 से संचालित हो रहा था, यानी लगभग 20 साल पुराना था। ऐसे में उसकी फिटनेस और मेंटेनेंस को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसके साथ ही यह भी सामने आया कि क्रूज का बीमा 30 मार्च को समाप्त हो चुका था। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि भुगतान प्रक्रिया पूरी कर ली गई थी, लेकिन तकनीकी कारणों से नवीनीकरण नहीं हो पाया।
मुआवजा और जिम्मेदारी की उलझन
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि मृतकों के परिजनों को मुआवजा कैसे मिलेगा? अगर बीमा वैध नहीं था, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? वॉटर स्पोर्ट्स विभाग के जीएम अजय श्रीवास्तव के अनुसार क्लेम प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, लेकिन अंतिम निर्णय बीमा कंपनी के रुख पर निर्भर करेगा।
चिकित्सा व्यवस्था पर भी उठे गंभीर प्रश्न
हादसे में बचीं वाराणसी की सविता वर्मा ने जो अनुभव साझा किया, उसने चिकित्सा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए। उनका आरोप है कि निजी अस्पताल में इलाज के बाद उनसे तत्काल बिल भुगतान का दबाव बनाया गया, जबकि उनकी स्थिति गंभीर थी और संसाधन उपलब्ध नहीं थे।


