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May 14, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

चुनावी मौसम में मुद्दे अक्सर अपने असली अर्थ खो देते हैं। महिला आरक्षण भी इस बार कुछ ऐसा ही हुआ सिद्धांत से ज्यादा सियासत का औज़ार बन गया। चैतन्य मिश्रा

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महिला आरक्षण बिल पहले ही संसद से पास हो चुका है। लागू होने की शर्त परिसीमन साफ़ तौर पर दर्ज है। यानी यह कोई तत्काल लागू होने वाला कदम नहीं था, बल्कि भविष्य का रोडमैप था। लेकिन चुनाव से ठीक पहले इसे इस तरह पेश किया गया जैसे महिलाओं को अधिकार देने की लड़ाई अभी-अभी लड़ी जा रही हो, और उसके रास्ते में विपक्ष खड़ा हो। सवाल यही है क्या यह सच में अधिकारों की लड़ाई थी, या चुनावी नैरेटिव गढ़ने की कोशिश?
अगर नीयत परखनी हो तो ज़मीन पर देखना पड़ेगा। पश्चिम बंगाल इसका ताज़ा उदाहरण है। वहां एक महिला मुख्यमंत्री थी ममता बनर्जी जिन्हें हटाने के लिए राजनीतिक लड़ाई अपनी पूरी तीव्रता पर थी। यह लोकतंत्र का हिस्सा है, सत्ता परिवर्तन स्वाभाविक है। लेकिन जिस तरह की भाषा और व्यक्तिगत हमले इस दौरान देखने को मिले, वह एक बड़े सवाल को जन्म देते हैं क्या महिला नेतृत्व का सम्मान सिर्फ तब तक है जब तक वह आपके पक्ष में हो?
महिला आरक्षण का मतलब सिर्फ सीटों की गिनती नहीं होता। इसका मतलब है राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को सम्मान और सुरक्षा देना। अगर एक ओर आप 33 प्रतिशत आरक्षण की बात करते हैं, और दूसरी ओर एक महिला मुख्यमंत्री के खिलाफ प्रचार में गरिमा की सीमाएं टूटती हैं, तो यह विरोधाभास साफ़ दिखता है।और अब जब सत्ता बदल चुकी है, तो अगला सवाल और भी सीधा है क्या उस राज्य में महिला नेतृत्व को प्राथमिकता मिलेगी? अगर महिला सशक्तिकरण सच में एजेंडा है, तो यह सिर्फ बिल पास कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह निर्णयों में दिखना चाहिए, नियुक्तियों में दिखना चाहिए, और राजनीतिक व्यवहार में भी।राजनीति में कथनी और करनी का अंतर नया नहीं है, लेकिन जब बात आधी आबादी की हो, तो यह अंतर और ज्यादा चुभता है। महिला आरक्षण कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का वादा है। और वादे तभी भरोसेमंद होते हैं जब वे हर परिस्थिति में एक जैसे निभाए जाएंचाहे वह संसद हो या चुनावी मैदान।वरना यह पूरा विमर्श सिर्फ एक सवाल बनकर रह जाएगा क्या महिलाओं का सम्मान भी अब वोट के हिसाब से तय होगा?

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