32.6 C
Jabalpur
May 14, 2026
सी टाइम्स
राष्ट्रीय

जलवायु परिवर्तन-अनुकूल खेती को बढ़ावा, टिकाऊ कृषि और मिट्टी की सेहत सुधारने पर जोर: सरकार



नई दिल्ली, 9 मई केंद्र सरकार ने जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए बड़े स्तर पर काम तेज कर दिया है। सरकार की ओर से जारी एक आधिकारिक फैक्टशीट के अनुसार, वर्ष 2014-15 में शुरू किए गए राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए) के तहत अब तक वर्षा-आधारित कृषि विकास (आरएडी) कार्यक्रम के लिए 2,119.84 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके हैं। इससे 8.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया है और करीब 14.35 लाख किसानों को लाभ मिला है।

सरकार ने बताया कि देश में जल संरक्षण और खेती में पानी के बेहतर इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए सूक्ष्म सिंचाई योजनाओं पर भी तेजी से काम किया जा रहा है। वर्ष 2015-16 से अब तक करीब 109 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सूक्ष्म सिंचाई के दायरे में लाया गया है, जिसके लिए केंद्र सरकार ने 26,325 करोड़ रुपए की सहायता जारी की है। सरकार ने 2025-26 से 2029-30 के बीच अगले पांच वर्षों में 100 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को माइक्रो इरिगेशन के तहत लाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप(पीडीएमसी)’ योजना के तहत हर साल कम से कम 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने की योजना बनाई गई है।

मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकार सॉइल हेल्थ कार्ड योजना पर भी विशेष ध्यान दे रही है। वर्ष 2025-26 के दौरान 97.53 लाख मिट्टी के नमूने एकत्र किए गए, जिनमें से 92.87 लाख नमूनों की जांच की गई। वहीं, वर्ष 2015 से अब तक कुल 25.79 करोड़ सॉइल हेल्थ कार्ड जारी किए जा चुके हैं। इन कार्डों के जरिए किसानों को फसल के अनुसार सही पोषक तत्वों और उर्वरकों के उपयोग की सलाह दी जाती है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और उत्पादन में भी सुधार आता है।

नीति आयोग की 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सॉइल हेल्थ कार्ड योजना के कारण किसानों ने यूरिया के अत्यधिक उपयोग को कम किया है और संतुलित उर्वरक इस्तेमाल की दिशा में प्रगति हुई है। सर्वे में शामिल 68.5 प्रतिशत किसानों ने माना कि सुझाए गए उपाय अपनाने से उनकी मिट्टी की गुणवत्ता में बड़ा सुधार हुआ, जबकि 25.7 प्रतिशत किसानों ने आंशिक सुधार की बात कही।

सरकार ने यह भी बताया कि वर्ष 2014 से 2025 के बीच राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली के तहत 2,996 जलवायु-अनुकूल फसल किस्में विकसित और जारी की गई हैं। इन नई किस्मों को इस तरह तैयार किया गया है कि वे बदलते मौसम और जलवायु परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन दे सकें।

भारत में करीब 60 प्रतिशत खेती वर्षा-आधारित क्षेत्रों में होती है, जो देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत योगदान देती है। ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और टिकाऊ खेती प्रणाली का विकास बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसी उद्देश्य से सरकार ने राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना के तहत राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन की शुरुआत की थी।

बाद में वर्ष 2018-19 से इस मिशन को ‘ग्रीन रिवोल्यूशन-कृषोन्नति योजना’ के तहत सब-मिशन के रूप में लागू किया गया। फिर 2022-23 से इसे प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (पीएमआरकेवीवाई) के तहत शामिल किया गया, ताकि जलवायु-अनुकूल और टिकाऊ कृषि विकास के लिए योजनाओं को एकीकृत तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।

सरकार के अनुसार, वर्षा-आधारित कृषि विकास कार्यक्रम के तहत किसानों को एकीकृत खेती प्रणाली अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें बहुफसली खेती, फसल चक्र, मिश्रित खेती के साथ बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को भी जोड़ा जा रहा है, ताकि किसानों की आय बढ़े और खेती अधिक सुरक्षित एवं टिकाऊ बन सके।

वित्त वर्ष 2025-26 में इस योजना के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 343.86 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इसके जरिए 96,013 किसानों को प्रशिक्षण भी दिया गया है।

अन्य ख़बरें

मणिपुर : नोनी जिले में घात लगाकर किए गए हमले में एक व्यक्ति की मौत

Newsdesk

मध्य प्रदेश : सीएम ने खरीफ फसलों के लिए एमएसपी में बढ़ोतरी का स्वागत किया, कहा- किसानों को होगा फायदा

Newsdesk

असम यूसीसी बहस: गौरव गोगोई ने भाजपा की समानता के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए

Newsdesk

Leave a Reply

Discover more from सी टाइम्स

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading