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**बरघाट (सिवनी) |** मध्य प्रदेश में महिला सुरक्षा को लेकर सरकार के सख्त निर्देशों के बावजूद सिवनी जिले का बरघाट थाना क्षेत्र सुर्खियों में है। यहाँ एक पीड़िता न्याय के लिए भटक रही है, लेकिन पुलिस प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठा नजर आ रहा है। आरोपी लाकेश नारबोदे और उसके साथियों के खिलाफ पुख्ता सबूत होने के बाद भी अब तक कार्रवाई ‘शून्य’ है।
*विवाद की जड़: मानसिक प्रताड़ना और सोशल मीडिया का दुरुपयोग*
पीड़िता द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, आरोपी लाकेश नारबोदे (पीड़िता का चचेरा भाई) और अन्य रिश्तेदारों द्वारा उसे लंबे समय से मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। मामला केवल पारिवारिक विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आरोपियों ने मर्यादा की सीमाएं लांघते हुए:
* सोशल मीडिया पर पीड़िता के खिलाफ अश्लील टिप्पणियांकीं।
फोन पर अभद्र गालियां और जान से मारने की धमकी दी।
सार्वजनिक रूप से महिला की छवि धूमिल करने का प्रयास किया।
*शिकायत के दिन बाद भी एफ आई आर दर्ज नहीं*
पीड़िता ने सुरक्षा की गुहार लगाते हुए 6 मई 2026 को थाना बरघाट में लिखित आवेदन सौंपा था। शिकायत में स्पष्ट उल्लेख है कि लाकेश नारबोदे की गतिविधियों से पीड़िता और उसका पूरा परिवार खौफ के साये में जीने को मजबूर है। विडंबना यह है कि हफ़्तों बीत जाने के बाद भी पुलिस ने अब तक प्राथमिकी (एफ आई आर )दर्ज नहीं की है और न ही आरोपी से पूछताछ की जहमत उठाई है।
> **पीड़िता का दर्द:** *”मैंने कानून पर भरोसा किया, लेकिन पुलिस की चुप्पी अपराधियों को शह दे रही है। लाकेश नारबोदे अब और भी बेखौफ होकर मुझे धमका रहा है। यदि मेरे परिवार को कुछ भी होता है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी बरघाट पुलिस प्रशासन की होगी।”*
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*प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सुलगते सवाल*
बरघाट पुलिस का यह टालमटोल वाला रवैया कई गंभीर सवाल खड़े करता है:
1. *दबाव या लापरवाही:* क्या पुलिस किसी रसूखदार के दबाव में आरोपी को संरक्षण दे रही है?
2. *महिला सुरक्षा पर सवाल:* मुख्यमंत्री के ‘महिला सशक्तिकरण’ के दावों का जमीनी स्तर पर पालन क्यों नहीं हो रहा?
3. *अनहोनी का इंतजार:* क्या पुलिस एफआईआर दर्ज करने के लिए किसी बड़ी अप्रिय घटना का इंतजार कर रही है?
*निष्कर्ष और चेतावनी*
क्षेत्र की जनता में इस मामले को लेकर गहरा रोष है। यदि समय रहते लाकेश नारबोदे पर कानूनी शिकंजा नहीं कसा गया, तो यह मामला मानवाधिकार आयोग और उच्च न्यायालय तक पहुँच सकता है। अब देखना यह है कि सिवनी पुलिस अधीक्षक इस मामले में संज्ञान लेकर पीड़िता को न्याय दिलाते हैं या बरघाट पुलिस की यह ‘कुंभकर्णी नींद’ जारी रहती है।


