जबलपुर। शहर के खाद्य विभाग की टीम की चौथा पुल स्थित सेरेनडिप्टी रेस्टोरेंट में की गई कार्रवाई के दौरान एक प्राइवेट कर्मचारी की सक्रियता सामने आने के बाद प्रशासनिक तंत्र में सनसनी फैल गई है। यह मामला न केवल विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि किस तरह निजी व्यक्तियों को सरकारी कार्रवाई में दखल देने की छूट मिल रही है।
सूत्रों ने बताया कि 14 मई की शाम खाद्य विभाग अधिकारी देवेन्द्र दुबे और संजय गुप्ता के साथ एक व्यक्ति लगातार नजर आ रहा था, जिसका विभाग से कोई औपचारिक संबंध नहीं है। यह व्यक्ति सीसीटीवी कैमरे में अधिकारियों के साथ बैठा दिखा, होटल संचालकों से पूछताछ कर रहा था, दस्तावेज खंगाल रहा था और यहां तक कि खाद्य सामग्री की जांच करने का प्रयास भी कर रहा था।
प्राइवेट कर्मचारी या विभागीय अधिकारी?
खाद्य अधिकारी देवेन्द्र दुबे ने इस मामले में बताया कि यह व्यक्ति उनका ड्राइवर है और उसे केवल गर्मी के कारण अंदर बुलाया गया था। लेकिन उन्होंने कर्मचारी का नाम बताने से कतराया। अधिकारियों के इस रवैये ने विवाद को और बढ़ा दिया है।
सूत्रों के अनुसार, इस प्राइवेट कर्मचारी ने न केवल पूछताछ की, बल्कि विभागीय कार्रवाई के दौरान अपने रौब के साथ ऐसा व्यवहार किया मानो वही सबसे बड़ा अधिकारी हो। होटल संचालकों से पूछताछ करना, दस्तावेज खंगालना, निरीक्षण करना—यह सब वह कर रहा था, जबकि उसका विभाग से कोई औपचारिक संबंध नहीं था।
सीसीटीवी में कैद हुआ पूरा खेल
सेरेनडिप्टी रेस्टोरेंट के सीसीटीवी कैमरे ने इस प्राइवेट कर्मचारी की हर हरकत कैद कर ली। फुटेज में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि वह अधिकारी की कुर्सी के पास बैठकर पूछताछ कर रहा है और अधिकारियों के साथ निर्णय लेने का प्रयास कर रहा है।
इस घटना ने सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर यह व्यक्ति केवल ड्राइवर है, तो उसे सरकारी कार्रवाई में दखल देने का अधिकार किसने दिया? किस नियम के तहत किसी निजी व्यक्ति को विभागीय दस्तावेज और जांच प्रक्रिया में हाथ डालने की अनुमति मिली?
विभाग में हड़कंप, सवाल खड़ा
इस खुलासे के बाद खाद्य विभाग के कर्मचारियों और शहर में चर्चा का बाजार गर्म हो गया है। कई लोग तो यह भी कह रहे हैं कि प्राइवेट कर्मचारी केवल जांच और पूछताछ ही नहीं करता, बल्कि अधिकारियों द्वारा बताए गए स्थान पर जाकर पैसे वसूलने की भी जानकारी है।
इस पूरे मामले ने यह साफ कर दिया है कि केवल एक ड्राइवर की भूमिका में दिखने वाला व्यक्ति कैसे विभागीय कार्रवाई में हस्तक्षेप कर सकता है और प्रशासनिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
अब जांच का रास्ता
अब यह देखना बाकी है कि खाद्य विभाग की उच्चाधिकारियों और प्रशासनिक तंत्र द्वारा इस प्रकरण की पूरी जांच कैसे की जाएगी। क्या यह सच साबित होगा कि प्राइवेट कर्मचारी केवल ड्राइवर था या उसने अधिकारियों की आड़ में अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कार्रवाई में दखल दिया?
जबलपुरवासियों की नजर अब इस मामले पर है और शहर में यह चर्चा तेज है कि सरकारी जांच प्रक्रिया में निजी हस्तक्षेप किस हद तक संभव हो सकता है।


