“किसी शहर की सभ्यता उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, उसके सार्वजनिक शौचालयों से पहचानी जाती है।”
जबलपुर इस कसौटी पर आज कटघरे में खड़ा है।
शहर के श्रीनाथ की तलैया, अहिंसा चौक और ऐसे ही कई सार्वजनिक स्थानों पर बने शौचालय आज सुविधा नहीं, बल्कि संक्रमण के खुले अड्डे बन चुके हैं। जिन जगहों को आम नागरिकों की सहूलियत के लिए बनाया गया था, वहां आज गंदगी, बदबू, कचरा, कीचड़ और लापरवाही का साम्राज्य है। हालात ऐसे हैं कि कोई नागरिक अगर मजबूरी में इन शौचालयों का उपयोग कर ले, तो उसे राहत नहीं, बीमारी मिलने की आशंका अधिक है।
यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि शहर का नागरिक टैक्स भरता है, सफाई शुल्क देता है, नगर निगम के दावों को सुनता है, स्वच्छता सर्वेक्षण के पोस्टर देखता है लेकिन जब उसे एक साफ शौचालय की जरूरत पड़ती है, तो उसके हिस्से में आता है बदबूदार दरवाजा, गंदगी से भरा फर्श और संक्रमण का डर।
कहावत है, “घर का आईना सच बोलता है।” शहर का आईना उसके सार्वजनिक स्थल होते हैं। और जब उस आईने में सार्वजनिक शौचालयों की यह तस्वीर दिखती है, तो सवाल उठता है जबलपुर सच में स्वच्छ है, या सिर्फ स्वच्छता के कागजों में सुंदर दिखाया जा रहा है?
सफाई सर्वेक्षण की चमक और जमीन की सड़ांध
हर साल स्वच्छता सर्वेक्षण आता है। अधिकारी बैठकों में व्यस्त हो जाते हैं। बैनर लगते हैं, फोटो खिंचते हैं, सोशल मीडिया पर शहर को चमकाने की बातें होती हैं। लेकिन उसी शहर में आम आदमी को एक साफ सार्वजनिक शौचालय तक न मिले, तो यह रैंकिंग किस काम की?
सवाल सीधा है अगर श्रीनाथ की तलैया, अहिंसा चौक और अन्य स्थानों पर वर्षों से सार्वजनिक शौचालय गंदगी में डूबे हैं, तो शहर को अच्छी रेटिंग कैसे मिल रही है? क्या सर्वेक्षण की टीम केवल सजाए गए मार्गों से गुजरती है? क्या उन्हें वही जगहें दिखाई जाती हैं, जहां पहले से चूना छिड़क दिया गया हो? क्या जनता के उपयोग वाले असली स्थानों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है?
सफाई का सच कैमरे के लिए नहीं, नागरिक के इस्तेमाल के समय सामने आता है।
महिलाओं के लिए यह सुविधा नहीं, अपमान है
पुरुष कई बार मजबूरी में असुविधा झेल लेते हैं, लेकिन महिलाओं के लिए गंदे सार्वजनिक शौचालय सिर्फ असुविधा नहीं, स्वास्थ्य और गरिमा दोनों पर हमला हैं। शहर में बाजार, चौक, चौराहे, धार्मिक स्थल और भीड़भाड़ वाले इलाकों में महिलाएं, छात्राएं, बुजुर्ग महिलाएं, कामकाजी महिलाएं रोज निकलती हैं। उन्हें सुरक्षित, स्वच्छ और उपयोग योग्य सार्वजनिक शौचालय मिलना कोई एहसान नहीं, उनका अधिकार है।
लेकिन जब शौचालयों की हालत ऐसी हो कि अंदर जाने से पहले ही बीमारी का भय पैदा हो जाए, तो यह व्यवस्था की असफलता नहीं, व्यवस्था की संवेदनहीनता है।
अब मानसून आने वाला है। बारिश के साथ गंदगी, जलभराव और संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में ये उपेक्षित शौचालय डेंगू, मलेरिया, यूरिनरी इन्फेक्शन, त्वचा रोग और अन्य संक्रामक बीमारियों के केंद्र बन सकते हैं। सवाल है क्या नगर निगम मानसून का इंतजार कर रहा है, ताकि बीमारी फैले और फिर दवा छिड़काव की फोटो खिंचवाई जाए?
जहां मुख्यमंत्री गुजरें, वहां सफाई तुरंत हो जाती है
इस शहर का एक कड़वा सच सभी जानते हैं। अगर किसी बड़े नेता, मंत्री या मुख्यमंत्री का काफिला किसी मार्ग से गुजरने वाला हो, तो रातों-रात सड़कें चमक जाती हैं। गड्ढे भर जाते हैं, कचरा उठ जाता है, चूना छिड़क जाता है, दीवारें रंग जाती हैं। शहर में बाजार, चौक, चौराहे, धार्मिक स्थल और भीड़भाड़ वाले इलाकों में महिलाएं, छात्राएं, बुजुर्ग महिलाएं, कामकाजी महिलाएं रोज निकलती हैं। उन्हें सुरक्षित, स्वच्छ और उपयोग योग्य सार्वजनिक शौचालय मिलना कोई एहसान नहीं, उनका अधिकार है।
लेकिन जब शौचालयों की हालत ऐसी हो कि अंदर जाने से पहले ही बीमारी का भय पैदा हो जाए, तो यह व्यवस्था की असफलता नहीं, व्यवस्था की संवेदनहीनता है।
अब मानसून आने वाला है। बारिश के साथ गंदगी, जलभराव और संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में ये उपेक्षित शौचालय डेंगू, मलेरिया, यूरिनरी इन्फेक्शन, त्वचा रोग और अन्य संक्रामक बीमारियों के केंद्र बन सकते हैं। सवाल है क्या नगर निगम मानसून का इंतजार कर रहा है, ताकि बीमारी फैले और फिर दवा छिड़काव की फोटो खिंचवाई जाए?
जहां मुख्यमंत्री गुजरें, वहां सफाई तुरंत हो जाती है
इस शहर का एक कड़वा सच सभी जानते हैं। अगर किसी बड़े नेता, मंत्री या मुख्यमंत्री का काफिला किसी मार्ग से गुजरने वाला हो, तो रातों-रात सड़कें चमक जाती हैं। गड्ढे भर जाते हैं, कचरा उठ जाता है, चूना छिड़क जाता है, दीवारें रंग जाती हैं।
तो क्या सफाई केवल सत्ता के स्वागत के लिए है?
क्या आम नागरिक इस शहर का नागरिक नहीं है?
क्या टैक्स देने वाले लोगों को स्वच्छता पाने के लिए मुख्यमंत्री का रूट मैप चाहिए?
जनता रोज गुजरती है, मगर व्यवस्था नहीं जागती। नेता गुजरते हैं, तो मशीनें, कर्मचारी, अधिकारी सब दौड़ पड़ते हैं। यही फर्क बताता है कि इस शहर में प्राथमिकता जनता नहीं, प्रदर्शन है।
टैक्स जनता का, आराम व्यवस्था का
नगर निगम और स्थानीय अधिकारी अगर इन हालात से अनजान हैं, तो यह उनकी अक्षमता है। अगर जानकर भी चुप हैं, तो यह लापरवाही है। और अगर वर्षों से यह स्थिति बनी हुई है, तो यह जनता के साथ सीधा अन्याय है।
जनता से टैक्स वसूला जाता है। सफाई के नाम पर बजट बनता है। योजनाएं बनती हैं। ठेके दिए जाते हैं। कागजों में रखरखाव होता है। लेकिन जमीन पर गंदगी जस की तस पड़ी रहती है। सवाल यह है कि इन सार्वजनिक शौचालयों की सफाई और रखरखाव की
जिम्मेदारी किसकी है? कौन निगरानी करता है? कितनी बार निरीक्षण होता है?
किसे भुगतान किया जाता है? और अगर भुगतान हो रहा है, तो सफाई कहां है?
यह कोई छोटी बात नहीं है। सार्वजनिक शौचालय की गंदगी सिर्फ बदबू नहीं फैलाती, यह व्यवस्था की सड़ांध को उजागर करती है।
जबलपुर को पोस्टर नहीं, सार्वजनिक गरिमा चाहिए
शहर को स्वच्छ बताने वाले पोस्टर दीवारों पर अच्छे लगते हैं, लेकिन नागरिकों को पोस्टर नहीं, साफ सुविधा चाहिए। जब किसी मां को अपने बच्चे को गंदे शौचालय में ले जाना पड़े, जब किसी महिला को संक्रमण के डर से घंटों असुविधा सहनी पड़े, जब किसी बुजुर्ग को बदबू और गंदगी के बीच जाना पड़े तो यह शहर की हार है।
स्वच्छता केवल सड़क झाड़ने का नाम नहीं है। स्वच्छता का मतलब है साफ शौचालय, साफ नालियां, नियमित कचरा उठाव, सुरक्षित पेयजल, जवाबदेह अधिकारी और सम्मानजनक नागरिक सुविधा।
जबलपुर को चमकदार रैंकिंग से पहले साफ शौचालय चाहिए।
जबलपुर को विज्ञापन से पहले व्यवस्था चाहिए।
जबलपुर को दावों से पहले जवाब चाहिए।
अब सवाल जनता पूछेगी
नगर निगम को बताना होगा कि वर्षों से बदहाल पड़े इन सार्वजनिक शौचालयों की जिम्मेदारी किसकी है। स्थानीय अधिकारियों को बताना होगा कि निरीक्षण कब हुआ। सफाई ठेकेदारों को बताना होगा कि भुगतान के बदले काम कहां हुआ। और स्वच्छता सर्वेक्षण की रैंकिंग पर गर्व करने वालों को बताना होगा कि क्या इन शौचालयों को भी उस गर्व में शामिल किया गया था?
क्योंकि अब जनता केवल बदबू सहने वाली भीड़ नहीं है। जनता टैक्स देती है, वोट देती है, सवाल भी पूछेगी।
जबलपुर की असली स्वच्छता उस दिन साबित होगी, जब मुख्यमंत्री के गुजरने से पहले नहीं, आम नागरिक के गुजरने से पहले शौचालय साफ होंगे। जब सफाई कैमरे के लिए नहीं, नागरिक की जरूरत के लिए होगी। जब स्वच्छता सर्वेक्षण की तैयारी फाइलों में नहीं, सार्वजनिक सुविधाओं में दिखाई देगी।
अभी तो हालात यही कहते हैं
यहां टैक्स जनता देती है, लेकिन सार्वजनिक शौचालयों में राज कीटाणुओं का चलता है।
और अगर व्यवस्था अब भी नहीं जागी, तो मानसून की पहली बारिश इन शौचालयों की गंदगी ही नहीं, नगर निगम के खोखले दावों को भी बहाकर जनता के सामने ले आएगी।


