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Jabalpur
June 15, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

66 करोड़ की नल जल योजना पर श्रमिकों का विद्रोह वेतन, सुरक्षा और श्रम अधिकारों की अनदेखी का आरोप
51 गांवों की जलापूर्ति हुई ठप


इंट्रो। अनूपपुर जिले की 66 करोड़ रुपये की किरगी ग्रामीण समूह जल प्रदाय योजना अब गंभीर विवादों में घिर गई है। योजना में कार्यरत कर्मचारियों ने सीएमआर इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड पर वर्षों से कम वेतन, सुरक्षा संसाधनों की कमी और श्रम कानूनों के उल्लंघन के आरोप लगाते हुए हड़ताल शुरू कर दी है। पंप बंद होने से 51 गांवों की जलापूर्ति प्रभावित हो गई है। अब सवाल उठ रहा है कि करोड़ों की परियोजना में श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा क्यों नहीं की गई है?

अनूपपुर।मध्यप्रदेश जल निगम मर्यादित द्वारा 66 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित किरगी ग्रामीण समूह जल प्रदाय योजना का उद्देश्य 51 गांवों तक शुद्ध पेयजल पहुंचाना था। इसके संचालन एवं रखरखाव का जिम्मा सी एम आर इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया है। कर्मचारियों का आरोप है कि वर्ष 2018 से लगातार सेवाएं देने के बावजूद उन्हें शासन द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानदेय तक नहीं दिया गया है। इतना ही नहीं, जल शोधन संयंत्र,पंप हाउस,फील्ड कर्मचारियों सहित संवेदनशील स्थानों पर कार्य करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण, बीमा और सुरक्षा निधि जैसी सुविधाओं से भी वंचित रखा गया है। कई बार शिकायतों और ज्ञापनों के बावजूद कोई समाधान नहीं निकला जिससे परेशान हो आखिरकार कर्मचारियों ने काम बंद कर हड़ताल शुरू कर दी है, जिससे पूरी योजना की कार्यप्रणाली और कंपनी की जवाबदेही पर सवाल खड़े हो गए हैं।

न्यूनतम वेतन अधिनियम पर सवाल

कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें शासन द्वारा निर्धारित दरों के अनुरूप भुगतान नहीं किया जा रहा है। यदि यह आरोप सही है तो यह न्यूनतम वेतन से जुड़े श्रम प्रावधानों के उल्लंघन का मामला बन सकता है। श्रमिकों का कहना है कि कई वर्षों से वेतन वृद्धि तक नहीं हुई जबकि महंगाई लगातार बढ़ती रही है। सवाल यह है कि करोड़ों की परियोजना में श्रमिकों को उनका वैधानिक अधिकार क्यों नहीं मिला है?

सुरक्षा उपकरण नहीं, जोखिम में कर्मचारियों की जान

जल शोधन संयंत्र, पंप हाउस और विद्युत उपकरणों के बीच काम करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा किट, हेलमेट, दस्ताने, जूते और अन्य सुरक्षा संसाधन उपलब्ध कराना नियोक्ता की जिम्मेदारी मानी जाती है। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें आज तक पर्याप्त सुरक्षा सामग्री नहीं दी गई है। यदि यह सही पाया जाता है तो यह कार्यस्थल सुरक्षा मानकों की अनदेखी का गंभीर मामला माना जा सकता है।

ईपीएफ, ईएसआई और सुरक्षा निधि पर उठे सवाल

हड़ताली कर्मचारियों का दावा है कि वर्षों की सेवा के बावजूद उन्हें सामाजिक सुरक्षा से जुड़े लाभों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है और न ही लाभ मिला है। श्रमिकों का कहना है कि सुरक्षा निधि और अन्य वैधानिक लाभ आज तक नहीं मिले है। यदि कर्मचारियों की पात्रता के बावजूद ऐसे लाभ नहीं दिए गए हैं तो संबंधित विभागों को इसकी जांच करनी चाहिए।

अधूरी व्यवस्था पंचायतों के हवाले करने की तैयारी?

कर्मचारियों और ग्रामीणों का आरोप है कि कई गांवों में आज भी नल कनेक्शन होने के बावजूद नियमित पानी नहीं पहुंच रहा है। इसके बावजूद पंचायतों को योजना हस्तांतरित करने की तैयारी की जा रही है। सवाल उठ रहा है कि जब व्यवस्था पूरी तरह सुचारु नहीं हुई तो उसका संचालन ग्राम पंचायतों पर क्यों डाला जा रहा है?

66 करोड़ खर्च, फिर जवाबदेही किसकी?

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी यदि कर्मचारी असंतुष्ट हैं और कई गांवों को नियमित जलापूर्ति नहीं मिल रही तो जवाबदेही किसकी तय होगी? हड़ताल ने न केवल कंपनी के संचालन पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में ला खड़ा किया है। अब ग्रामीणों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों की निगाह प्रशासन, जल निगम और संबंधित कंपनी के जवाब पर टिकी हुई है।यह मामला केवल कर्मचारियों की हड़ताल का नहीं बल्कि करोड़ों रुपये की सार्वजनिक परियोजना में श्रमिक अधिकारों, सुरक्षा मानकों और जवाबदेही का भी है। यदि कर्मचारियों के आरोप सही हैं तो संबंधित विभागों को निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार पक्षों पर कार्यवाही करनी चाहिए, ताकि न तो श्रमिकों के अधिकार प्रभावित हों और न ही 51 गांवों की जनता पेयजल संकट का सामना करे।

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