टाटा कंसल्टैंसी सर्विसेज (टीसीएस) के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन दो टूक यह कह कर खतरे की घंटी बजा दी है कि उनकी कंपनी में अब जितने मानव कर्मचारी होंगे, उतनी ही संख्या आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) एजेंट लगाए जाएंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि मानव कर्मचारियों की संख्या अगले कुछ वर्षों में आधी रह जाएगी। जो टीसीएस में होगा, जाहिर है, वही रुझान अन्य आईटी कंपनियों में भी देखने को मिलेगा। भारत की आईटी इंडस्ट्री में फिलहाल 60 लाख से ज्यादा कर्मचारी हैं। इस क्षेत्र में तनख्वाह अपेक्षाकृत ज्यादातर अन्य क्षेत्रों से अधिक रही है।टीसीएस में मानव कर्मचारियों की संख्या आधी रह जाएगी। जो वहां होगा, वही रुझान अन्य आईटी कंपनियों में भी देखने को मिल सकता है। भारत की आईटी इंडस्ट्री में फिलहाल 60 लाख से ज्यादा कर्मचारी हैं।
इस रूप में ये उद्योग भारत में उपभोक्ता मध्य वर्ग का सबसे बड़ा सहारा है। आय कर दाताओं में सबसे बड़ा हिस्सा आईटी कर्मियों का ही है। अब अगर रोजगार के लिहाज से देखें, तो एआई इस क्षेत्र के लिए तलवार बन कर आई है। नए डिग्रीधारियों के लिए अवसर यहां पहले से सिकुड़ रहे हैं। पिछले साल कर्मचारियों की छंटनी भी जोर पकड़ गई। खुद टीसीएस से 12 हजार कर्मी निकाले गए। अब चंद्रशेखरन ने साफ किया है कि यह सब नीतिगत निर्णय के तहत हो रहा है। आशंका पहले से जताई जा रही है कि इन सबका असर मध्य वर्ग के सिकुडऩे के रूप में सामने आएगा। यानी आईटी इंडस्ट्री में जो होने जा रहा है, उसके परिणाम दूरगामी हैं। बेशक, एआई से नए कौशल वाली कुछ नौकरियां पैदा होंगी। लेकिन ट्रेंड यह है कि एआई एजेंट दोहराव वाले हर ऐसे कार्य के लिए प्रशिक्षित होते जा रहे हैं, जिनमें तकनीकी कौशल की जरूरत पड़ती है। स्पष्टत: जितनी नौकरियां जाएंगी, उसकी तुलना में बहुत कम नए रोजगार पैदा होंगे। और यह तो सिर्फ आईटी इंडस्ट्री की बात है। एआई का उपयोग ऐसे अनेक क्षेत्रों में बढ़ रहा है, जहां ह्वाइट कॉलर रोजगार के अवसर बनते रहे हैं। वहां भी तलवार गिरने वाली है।मतलब यह कि साल 2000 के आसपास इंजीनियरिंग कॉलेज की डिग्री लेकर बेहतर करियर बना लेने का जो भरोसा भारत में बना, अब उसकी नींव हिलने लगी है।नौकरियों की संभावना नहीं होगी, तो इंजीनियरिंग कॉलेजों के फैले जाल पर भी बुरा असर पड़ेगा।


