July 1, 2026
सी टाइम्स
इनसाइट टुडे

डुमना एयरपोर्ट पर उतरते ही यात्रियों की जेब पर बोझ ,बंद शटल सेवा के बीच कैब किराये पर उठे सवाल

जबलपुर। डुमना एयरपोर्ट पर हवाई यात्रा की चमकदार तस्वीर के बीच यात्रियों की एक बुनियादी परेशानी फिर सामने आई है। शहर से बाहर बने एयरपोर्ट पर उतरने के बाद यात्रियों को शहर तक पहुंचने के लिए सस्ती और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन सुविधा नहीं मिल पा रही है। स्थानीय रिपोर्टों और यात्रियों की शिकायतों के अनुसार, एयरपोर्ट से शहर आने के लिए कुछ कैब चालक 1000 से 1100 रुपये तक किराया मांग रहे हैं। यह स्थिति उन यात्रियों के लिए और मुश्किल बन रही है जो पहली बार जबलपुर आते हैं, जिनके पास स्थानीय संपर्क नहीं है या जो देर शाम/रात की फ्लाइट से एयरपोर्ट पहुंचते हैं।

मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जबलपुर सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विस लिमिटेड यानी JCTSL की आधिकारिक जानकारी में डुमना एयरपोर्ट शटल सेवा का किराया केवल 150 रुपये बताया गया है। JCTSL की वेबसाइट पर एयरपोर्ट शटल को ISBT, SBI चौक, एकता चौक, तीन पत्ती, नौदरा ब्रिज, रेलवे स्टेशन और कलचुरी होटल जैसे प्रमुख स्थानों से जोड़ने वाली सुविधा के रूप में दर्ज किया गया है। वेबसाइट पर एयरपोर्ट शटल के लिए हेल्पलाइन नंबर और समय-सारणी भी उपलब्ध है।

कागज पर सुविधा, जमीन पर असमंजस
डुमना एयरपोर्ट शहर के मुख्य हिस्सों से दूरी पर स्थित है। ऐसे में एयरपोर्ट से शहर तक की “लास्ट माइल कनेक्टिविटी” यात्रियों के लिए सबसे अहम कड़ी बन जाती है। एयरपोर्ट तक हवाई सेवा भले आधुनिक हो गई हो, लेकिन एयरपोर्ट से घर, होटल, रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड तक पहुंचने की व्यवस्था यदि भरोसेमंद नहीं है, तो पूरी यात्रा का अनुभव खराब हो जाता है।

यात्रियों का कहना है कि जब शटल बस उपलब्ध नहीं होती या समय पर नहीं मिलती, तो वे मजबूरी में निजी कैब या टैक्सी पर निर्भर हो जाते हैं। इसी मजबूरी का फायदा उठाते हुए कथित तौर पर कुछ चालक मनमाना किराया बताते हैं। बाहरी शहरों से आने वाले यात्री स्थानीय रूट, दूरी और वास्तविक किराये से परिचित नहीं होते, इसलिए वे अक्सर बिना अधिक मोलभाव के मांगी गई राशि देने को मजबूर हो जाते हैं।

यह शिकायत केवल किराये की नहीं है। यह व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा है। यदि आधिकारिक रूप से 150 रुपये की शटल सेवा सूचीबद्ध है, तो यात्रियों को यह साफ जानकारी मिलनी चाहिए कि सेवा चालू है या बंद, बस किस समय आएगी, टिकट कहां मिलेगा और सेवा न चलने की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था क्या है।

करोड़ों की एयरपोर्ट अपग्रेडेशन योजना, लेकिन कनेक्टिविटी कमजोर
जबलपुर एयरपोर्ट को बेहतर सुविधाओं से जोड़ने के लिए बड़े स्तर पर अपग्रेडेशन किया गया है। प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो की पुरानी आधिकारिक जानकारी के अनुसार एयरपोर्ट अपग्रेडेशन में नए टर्मिनल भवन, रनवे विस्तार, ATC टॉवर, फायर स्टेशन और अन्य सुविधाओं को शामिल किया गया था। इस परियोजना की लागत 412 करोड़ रुपये बताई गई थी और नए टर्मिनल में पीक आवर्स में 500 यात्रियों को संभालने की क्षमता का लक्ष्य रखा गया था। मार्च 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्वालियर और जबलपुर एयरपोर्ट के टर्मिनल भवनों का वर्चुअल उद्घाटन किया था।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पर इतना निवेश हुआ है, तो यात्रियों के लिए शहर तक पहुंचने की सस्ती, नियमित और नियंत्रित व्यवस्था क्यों कमजोर दिखाई दे रही है। आधुनिक एयरपोर्ट केवल टर्मिनल बिल्डिंग से नहीं बनता, उसकी असली उपयोगिता तब साबित होती है जब यात्री सुरक्षित, पारदर्शी और उचित दर पर शहर तक पहुंच सके।

यात्रियों के सामने तीन बड़ी परेशानियां
पहली परेशानी है किराये की अस्पष्टता। एयरपोर्ट से शहर के प्रमुख स्थानों तक निजी कैब का उचित किराया कितना होना चाहिए, इसका कोई साफ और बड़े अक्षरों में प्रदर्शित चार्ट यात्रियों को आसानी से नजर नहीं आता। जब किराया तय व्यवस्था से नहीं बल्कि मौके की मजबूरी से तय होता है, तो विवाद की संभावना बढ़ती है।

दूसरी परेशानी है शटल सेवा की अनिश्चितता। JCTSL की जानकारी में सेवा दर्ज है, लेकिन यदि किसी दिन बस खराब है, सेवा बंद है या समय बदला गया है, तो इसकी सूचना यात्रियों को एयरपोर्ट पर स्पष्ट रूप से मिलनी चाहिए। वेबसाइट पर सेवा दिखना और जमीन पर यात्री को बस न मिलना, दोनों के बीच का अंतर ही शिकायतों को जन्म देता है।

तीसरी परेशानी है शिकायत व्यवस्था की कमजोर दृश्यता। एयरपोर्ट पर QR कोड, शिकायत नंबर या हेल्पलाइन प्रदर्शित होना पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि शिकायत दर्ज होने के बाद उस पर कार्रवाई हो, शिकायतकर्ता को अपडेट मिले और यदि कोई चालक बार-बार मनमानी कर रहा है तो उसके खिलाफ रिकॉर्ड आधारित कार्रवाई हो।

प्रशासन के सामने जरूरी सवाल
इस मामले में एयरपोर्ट प्रबंधन, नगर परिवहन व्यवस्था, स्थानीय प्रशासन और परिवहन विभाग सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि एयरपोर्ट शटल सेवा वर्तमान में नियमित रूप से चल रही है या नहीं। यदि बस खराब है या सेवा अस्थायी रूप से बंद है, तो उसकी जगह वैकल्पिक बस क्यों नहीं लगाई गई? यदि निजी कैब एयरपोर्ट परिसर से यात्रियों को ले जा रही हैं, तो क्या उनके लिए कोई अधिकृत दर, रजिस्ट्रेशन, पहचान और शिकायत तंत्र तय है?

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या एयरपोर्ट पर प्रीपेड टैक्सी काउंटर, अधिकृत कैब बूथ, किराया सूची और CCTV-आधारित निगरानी लागू की जा सकती है। बड़े शहरों में एयरपोर्ट से शहर तक जाने वाली टैक्सी व्यवस्था में रसीद, वाहन नंबर, चालक की पहचान और किराया पहले से दर्ज होता है। जबलपुर जैसे तेजी से विकसित होते शहर में भी ऐसी व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।

क्या किया जा सकता है
यात्रियों की परेशानी कम करने के लिए तत्काल स्तर पर एयरपोर्ट पर बड़े डिस्प्ले बोर्ड लगाए जाने चाहिए, जिनमें एयरपोर्ट से रेलवे स्टेशन, ISBT, तीन पत्ती, नौदरा ब्रिज, मदन महल, गोरखपुर, ग्वारीघाट, विजय नगर और अन्य प्रमुख क्षेत्रों तक अनुमानित किराये की जानकारी हो। JCTSL शटल का लाइव स्टेटस या कम से कम दिन की अपडेटेड टाइमिंग डिस्प्ले होनी चाहिए।

JCTSL को एयरपोर्ट फ्लाइट टाइमिंग के अनुसार शटल सेवा को लिंक करना चाहिए। यदि किसी दिन बस उपलब्ध नहीं है, तो इसकी सूचना एयरपोर्ट, वेबसाइट, सोशल मीडिया और हेल्पलाइन पर तुरंत दी जानी चाहिए। साथ ही, एयरपोर्ट से शहर के लिए कम से कम एक वैकल्पिक मिनी बस या साझा वाहन व्यवस्था रखी जा सकती है।

एयरपोर्ट परिसर में कैब चालकों की पहचान, वाहन नंबर, अधिकृत/अनधिकृत स्थिति और किराया रसीद व्यवस्था को अनिवार्य किया जा सकता है। किसी भी तरह की जबरदस्ती, धमकी या यात्रियों को घेरकर किराया तय करने जैसी शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए।

डुमना एयरपोर्ट जबलपुर की बढ़ती हवाई पहचान का प्रतीक है, लेकिन एयरपोर्ट से शहर तक का सफर यदि यात्रियों के लिए महंगा, अनिश्चित और तनावपूर्ण बना रहेगा, तो यह शहर की छवि को नुकसान पहुंचाएगा। यह मामला केवल कैब किराये की शिकायत नहीं, बल्कि शहर की कनेक्टिविटी, यात्री सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा है। एयरपोर्ट की आधुनिक इमारत तभी पूरी मानी जाएगी, जब उसके बाहर खड़े यात्री को यह भरोसा हो कि शहर तक पहुंचने के लिए उसे न तो मनमाना किराया देना पड़ेगा और न ही व्यवस्था के अभाव में असहाय महसूस करना पड़ेगा।

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