बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में करीब 50 से 70 हाथियों की मौजूदगी, शहडोल के ब्यौहारी क्षेत्र में भी 25 हाथियों का दल
शहडोल 12 अगस्त 2026- मध्यप्रदेश के जंगलों में हाथियों की उपस्थिति लगातार बढ़ रही है। बाघों के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व अब हाथियों के लिए भी अनुकूल रहवास के रूप में उभर रहा है। यहां हाथियों का कुनबा लगातार फल-फूल रहा है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व एवं आसपास के लैंडस्केप में वर्तमान में करीब 50 से 70 जंगली हाथियों की मौजूदगी का अनुमान है। वहीं शहडोल जिले के पश्चिमी ब्यौहारी क्षेत्र में भी करीब 25 हाथियों का दल पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से लगातार रह रहा है।
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक श्री अनुपम सहाय के अनुसार बांधवगढ़ में हाथियों की नियमित उपस्थिति अक्टूबर 2018 में स्पष्ट रूप से दर्ज हुई। ये हाथी संजय गांधी टाइगर रिजर्व से बांधवगढ़ लैंडस्केप कॉरिडोर के माध्यम से यहां पहुंचे। इसके बाद धीरे-धीरे हाथियों की संख्या और उनके विचरण क्षेत्र में विस्तार हुआ।
हाथियों का विचरण मुख्य रूप से खेतौली, पनपथा कोर, ताला एवं कल्लवाह क्षेत्र में देखा जा रहा है। हाथी किसी एक क्षेत्र में स्थाई रूप से सीमित नहीं रहते, बल्कि भोजन, पानी एवं अन्य आवश्यकताओं के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में विचरण करते हैं। यही कारण है कि किसी एक रेंज में हाथियों की स्थाई संख्या निर्धारित करना कठिन होता है और उनकी नियमित निगरानी की जाती है।
बांधवगढ़ का विस्तृत प्राकृतिक एवं सुरक्षित वन परिदृश्य हाथियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराता है। यहां अलग-अलग मौसम में पर्याप्त भोजन एवं पानी, घास के मैदान, बांस के क्षेत्र, साल एवं मिश्रित वन तथा अन्य प्राकृतिक वनस्पतियां उपलब्ध हैं। सुरक्षित वातावरण और अपेक्षाकृत कम मानव हस्तक्षेप के कारण हाथियों को यहां अनुकूल रहवास मिल रहा है।
हाथियों की बढ़ती मौजूदगी से बांधवगढ़ के वन्यजीव पर्यटन में भी नया आकर्षण जुड़ा है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरण करते हाथियों के झुंड, उनके साथ मौजूद बच्चे तथा उनका प्राकृतिक सामाजिक व्यवहार पर्यटकों के लिए रोमांचकारी अनुभव बन रहा है। बांधवगढ़ में हाथियों के संरक्षण एवं मानव-हाथी सहअस्तित्व को मजबूत करने के लिए प्रबंधन द्वारा तकनीक, वैज्ञानिक अध्ययन, सामुदायिक भागीदारी और नियमित मॉनिटरिंग को अपनाया गया है। हाथियों की लोकेशन, मूवमेंट एवं अलर्ट की जानकारी के लिए विशेष गजरक्षक एप का उपयोग किया जा रहा है। स्थानीय समुदाय की भागीदारी के लिए हाथी मित्र दल गठित किए गए हैं। इसके अलावा रेडियो कॉलरिंग एवं वैज्ञानिक मॉनिटरिंग के माध्यम से हाथियों की गतिविधियों और विचरण क्षेत्र का अध्ययन किया जा रहा है। हाथियों की पहचान उनके कानों के आकार, दाग-धब्बों, दांतों की बनावट, पूंछ और शरीर की अन्य विशिष्ट विशेषताओं के आधार पर की जाती है तथा प्रत्येक हाथी को अलग पहचान नंबर दिया जाता है।
हाथियों से संबंधित सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान और कार्रवाई के लिए एलीफेंट कंट्रोल रूम के माध्यम से निगरानी की व्यवस्था की गई है। फ्रंटलाइन स्टाफ को समय-समय पर प्रशिक्षण एवं कार्यशालाओं के माध्यम से हाथी प्रबंधन से संबंधित जानकारी दी जा रही है। अन्य राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल में हाथी प्रबंधन एवं मानव-हाथी संघर्ष न्यूनीकरण के अनुभवों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाने का प्रयास किया जा रहा है।
शहडोल के ब्यौहारी क्षेत्र में भी 25 हाथियों का दल
शहडोल उत्तर वनमंडल की डीएफओ श्रीमती तरुणा वर्मा के अनुसार शहडोल क्षेत्र में हाथियों का आवागमन ऐतिहासिक रूप से रहा है। हाल के वर्षों में वर्ष 2005 के आसपास हाथियों का शहडोल क्षेत्र में आना-जाना दर्ज हुआ। वर्ष 2018 में हाथियों का एक झुंड यहां आया और बाद में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व क्षेत्र में स्थाई रूप से रह गया।
वर्तमान में शहडोल उत्तर वनमंडल के पश्चिमी ब्यौहारी क्षेत्र में लगभग 25 हाथियों का एक दल पिछले करीब डेढ़ वर्ष से रह रहा है। यह क्षेत्र हाथियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध करा रहा है। बाणसागर के बैकवाटर क्षेत्र में पर्याप्त पानी, अपेक्षाकृत कम मानव बस्तियां और कम मानव हस्तक्षेप के साथ-साथ बांस के जंगलों में पर्याप्त भोजन उपलब्ध होने से हाथियों को सुरक्षित एवं अनुकूल वातावरण मिल रहा है। स्टेटस ऑफ एलिफेंट इन इंडिया 2021-25 की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में जंगली हाथियों की कुल संख्या 97 दर्ज की गई है। यह रिपोर्ट देश की पहली डीएनए आधारित हाथी गणना पर तैयार की गई है, जिसे भारतीय वन्यजीव संस्थान एवं प्रोजेक्ट एलिफेंट द्वारा जारी किया गया है।
इतिहास में मध्यप्रदेश का क्षेत्र हाथियों का महत्वपूर्ण रहवास रहा है। 16वीं-17वीं सदी तक यहां हाथियों की बड़ी आबादी होने के उल्लेख मिलते हैं। बाद में शिकार, जंगलों की कटाई एवं बढ़ते मानव हस्तक्षेप के कारण वर्ष 1925 तक मध्यप्रदेश में हाथियों की संख्या शून्य हो गई थी। अब करीब एक सदी बाद छत्तीसगढ़, ओड़िशा एवं झारखंड की ओर से हाथियों का मध्यप्रदेश में आगमन हुआ है और वे यहां के अनुकूल वन क्षेत्रों में अपना रहवास बना रहे हैं।
वर्तमान में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व, संजय-दुबरी टाइगर रिजर्व और शहडोल के बाणसागर बैकवाटर क्षेत्र हाथियों के पसंदीदा रहवास के रूप में उभर रहे हैं।
क्षेत्र संचालक श्री अनुपम सहाय के अनुसार हाथियों का संरक्षण केवल एक प्रजाति के संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे जंगल, उसके पारिस्थितिकी तंत्र तथा मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व की रक्षा से जुड़ा विषय है। बांधवगढ़ में प्रयास किया जा रहा है कि हाथी जंगल में सुरक्षित रहें और स्थानीय समुदाय भी उनके साथ सुरक्षित रूप से सहअस्तित्व कायम रखते हुए आगे बढ़े।
भारत में जंगली हाथियों की कुल संख्या 22,486 बताई गई है। राज्यवार स्थिति में कर्नाटक में सबसे अधिक हाथी हैं, इसके बाद असम, तमिलनाडु, केरल, उत्तराखंड एवं ओडिशा का स्थान है। मध्यप्रदेश में भी हाथियों की बढ़ती संख्या और मानव-हाथी सहअस्तित्व की स्थिति वन्यजीव संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखी जा रही है।


