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जबलपुर। हनुमान जी से केवल बल और बुद्धि ही नहीं, बल्कि उनकी निष्काम भक्ति, विनम्रता और प्रभु श्रीराम के प्रति अनन्य निष्ठा प्राप्त करने की भी प्रार्थना करनी चाहिए। जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं समर्पण का भाव प्रकट होता है और समर्पण के माध्यम से ही प्रभु की कृपा का अनुभव होता है। यह उद्गार परमहंस स्वामी गिरीशानंद सरस्वती जी महाराज ने कटंगा स्थित विंध्य भवन, जबलपुर में 21 से 25 अक्टूबर तक आयोजित हनुमत चरित्र प्रवचन सत्र के प्रथम दिन व्यक्त किए।
महाराज जी ने कहा कि जहाँ ‘मैं’ समाप्त होता है, वहाँ ‘राम’ का आरंभ होता है। जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहाँ समर्पण प्रकट होता है और जहाँ समर्पण होता है, वहाँ प्रभु की कृपा का अनुभव होने लगता है। आध्यात्मिक दृष्टि से हनुमान जी की सबसे बड़ी शक्ति उनका शरीर नहीं, बल्कि उनका समर्पण था। उनका सबसे बड़ा सामर्थ्य उनकी बुद्धि नहीं, बल्कि उनकी भक्ति थी। इसी प्रकार उनकी सबसे बड़ी सिद्धि उनका शारीरिक बल नहीं, बल्कि उनके हृदय में विराजमान प्रभु श्रीराम थे।
उन्होंने हनुमान जी के चरित्र से प्रेरणा लेते हुए भक्ति, विनम्रता और पूर्ण समर्पण को जीवन में अपनाने का संदेश दिया। उनके अनुसार, हनुमान जी का जीवन सिखाता है कि वास्तविक शक्ति अहंकार में नहीं, बल्कि प्रभु के प्रति अटूट विश्वास और निष्ठा में निहित है।
प्रवचन सत्र के प्रथम दिन प्रभु श्री रामभद्र सरकार एवं स्वामी गिरीशानंद सरस्वती जी महाराज का पूजन न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल, सांसद आशीष दुबे, वरिष्ठ अधिवक्ता रविश अग्रवाल, अजीत समदड़िया, ठाकुर शैलेन्द्र सिंह, तनुश्री सिंह, हितेंद्र सिंह, संजय अग्रवाल, भरत परिहार एवं अशोक रंगा सहित अन्य श्रद्धालुओं ने किया। पूजन पंडित रोहित दुबे ने संपन्न कराया, जबकि कार्यक्रम का संचालन पंडित सौरभ दुबे ने किया।


