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June 11, 2026
सी टाइम्स
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महामारी की समाप्ति के बाद चीन और भारत को हाथ मिलाकर आगे बढ़ना चाहिए

बीजिंग, 31 दिसम्बर | दुनिया भर में महामारी की समाप्ति के साथ, आर्थिक विकास एक बार फिर सभी देशों का ध्यान केंद्रित हो गया है। पिछले तीन वर्षों में, कोविड-19 महामारी ने विश्व अर्थव्यवस्था को कड़ी टक्कर दी है। यूरोप, उत्तरी अमेरिका से लेकर पूर्वी एशिया तक, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की आर्थिक वृद्धि में गिरावट दिखने लगी। अब तेजी से आर्थिक सुधार, रोजगार में सुधार और आर्थिक व व्यापार सहयोग को बढ़ाने की आवश्यकता जाहिर है।

महामारी का सामना करने और आर्थिक बहाल करने में चीन और भारत का प्रदर्शन प्रशंसनीय है। चीन ने तीन साल की महामारी अवधि के दौरान सकारात्मक विकास बनाए रखा है। 2021 में चीन की जीडीपी वृद्धि दर 8.1 प्रतिशत रही। 2022 के पहले 11 महीनों में अनेक चुनौतियों के बावजूद चीन के आयात और निर्यात में 8.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। चीन में पूरी औद्योगिक प्रणाली, मजबूत उत्पादन क्षमता और विशाल बाजार के लाभ नहीं बदले हैं। उधर, महामारी प्रतिबंध हटने के बाद भारत की आर्थिक रिकवरी में भी संतोषजनक प्रदर्शन दिखाया गया है। अप्रैल से जून 2022 तक, भारत की जीडीपी 13.5 प्रतिशत बढ़ी, और सेवा उद्योग भी निरंतर विस्तार की स्थिति में है। अक्षम क्षेत्रीय बाजारों की जगह लेते हुए भारत में एक बड़े राष्ट्रीय एकीकृत बाजार का निर्माण पूरा हो गया है। वर्तमान में, भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, और जीवन के सभी क्षेत्रों में अभी भी आर्थिक उन्नयन को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त लचीलापन और सुधार जागरूकता दिखाने की आवश्यकता है।

2022 में अमेरिकी डॉलर की असीमित मात्रात्मक सहजता और रुपये के तेज मूल्यह्रास ने भारत की घरेलू मुद्रास्फीति को बढ़ा दिया। भारत की अर्थव्यवस्था के आगे विकास के लिए मजबूत बाहरी समर्थन की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थितियों में, एक स्वस्थ और स्थिर चीन-भारत संबंध बनाए रखना और द्विपक्षीय आर्थिक और व्यापार सहयोग का विस्तार करना दोनों देशों के सामान्य हित में है। दोनों देशों के नेताओं ने कहा है कि चीन और भारत के बीच सहयोग पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करेगा। दोनों पक्षों को संचार और समन्वय को मजबूत करने, एक दूसरे का समर्थन करने, संयुक्त रूप से बहुपक्षवाद को बनाए रखने और वैश्विक शासन में सुधार के लिए अधिक सकारात्मक ऊर्जा लगाने की आवश्यकता है। चीन और भारत प्रतिद्वंद्वियों के बजाय भागीदार हैं, और उन्हें एक-दूसरे का समर्थन करना चाहिए। यह चीन और भारत के बीच एक आम सहमति है।

वास्तव में, कई अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों और तंत्रों में, चीन और भारत ने हमेशा घनिष्ठ सहयोग और आदान-प्रदान बनाए रखा है। दोनों देशों ने जलवायु परिवर्तन, शंघाई सहयोग संगठन, ब्रिक्स तंत्र, एशियन इन्फ्रास्ट्रक्च र इन्वेस्टमेंट बैंक और न्यू डेवलपमेंट बैंक आदि में स्थिर और प्रभावी सहयोह किये हैं। आंकड़ों के अनुसार, 2021 में, चीन और भारत के बीच व्यापार की मात्रा 125.66 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंची, चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बना रहा। द्विपक्षीय संबंधों को दीर्घकालीन ²ष्टिकोण से देखना, एक-दूसरे के विकास को उभय-जीत की सोच के साथ देखना, और सहयोगात्मक रवैये के साथ बहुपक्षीय प्रक्रियाओं में भाग लेना द्विपक्षीय संबंधों के लिए महत्वपूर्ण आधार है। हालांकि, हाल के वर्षों में भारत द्वारा चीनी कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंधात्मक उपायों के कारण, भारत में चीनी कंपनियों के निवेश में गिरावट जारी है। चीन की उम्मीद है कि भारत कारोबारी माहौल में सुधार कर सकता है, चीनी कंपनियों सहित सभी विदेशी निवेशकों के साथ निष्पक्ष, पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण तरीके से व्यवहार कर सकता है, ताकि दोनों देशों के बीच सामान्य आर्थिक और व्यापार सहयोग के लिए स्थितियां बना सके। अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के पूर्वानुमान के अनुसार, वर्ष 2030 तक भारत की जीडीपी 8.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगी, तब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा। और उस समय तक चीन की जीडीपी 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगी। जो चीन और भारत के बीच आर्थिक और व्यापार सहयोग के लिए अधिक अवसर प्रदान करेगा।

हालांकि, दुनिया में कुछ शक्तियां हमेशा भारत को पश्चिम के चीन-विरोधी रथ के साथ जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। उन्हों ने कहा कि चीन अमेरिका, पश्चिम और भारत का सामान्य प्रतिद्वंद्वी है, मतलब है कि भारत उनका साझा मूल्य भागीदार है। इस के प्रति भारतीय नेताओं ने हमेशा स्पष्ट रुख से चीन को खतरा नहीं बल्कि भागीदार माना है। वास्तव में, चाहे वह तथाकथित सामान्य मूल्य हों या अन्य, भारत को अपने स्वयं के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और गरीबी जैसी सामाजिक समस्याओं को हल करने के व्यावहारिक हितों की आवश्यकता है। चीन के साथ संबंधों में अमेरिकी शतरंज का एक मोहरा बनना भारत के महत्वपूर्ण हितों को खतरे में डालना तय है। वास्तव में, यह लंबे समय से भारतीय राजनीतिक नेताओं के निर्णय में रहा है।

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