Exam stress in students – आज देश की शिक्षा व्यवस्था एक गंभीर संकट से गुजर रही है। टॉपर संस्कृति का अत्यधिक दबाव, अव्वल आने की अंधी दौड़, आसमानी अपेक्षाएं और शिक्षा तंत्र की विसंगतियां छात्रों को तनाव, अवसाद और अंततः आत्महत्या जैसे भयावह कदम उठाने को विवश कर रही हैं। यह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि बेहद चिंताजनक भी है कि हमारे देश की प्रतिभाएं इस अमानवीय प्रतिस्पर्धा की भेंट चढ़ रही हैं।
हाल ही में छात्रों की लगातार हो रही आत्महत्याएं केवल आंकड़े नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा प्रणाली की असफलताओं की करुण चीख हैं। कोटा जैसे शहर, जो कभी ‘शिक्षा के मंदिर’ कहे जाते थे, अब ‘अवसाद और आत्महत्या’ के केंद्र बनते जा रहे हैं। इस वर्ष अकेले कोटा में 14 छात्रों ने आत्महत्या की, जो हमारी संवेदनहीन नीतियों और संरचनात्मक खामियों की ओर साफ इशारा करता है।
अंधी प्रतिस्पर्धा, गलाकाट स्पर्धा और “सफलता की गारंटी” जैसे भ्रामक वादों के बल पर चलने वाले कोचिंग संस्थान छात्रों की मानसिकता को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) द्वारा हाल ही में कोचिंग संस्थानों को दिए गए नोटिस इस बात के प्रमाण हैं कि ये संस्थान अपने भ्रामक विज्ञापनों और अनुचित व्यावसायिक प्रथाओं के ज़रिए छात्रों और अभिभावकों को एक खतरनाक चक्रव्यूह में धकेल रहे हैं।
दरअसल, हमारी शिक्षा प्रणाली ने योग्यता को रैंक और अंकों से जोड़ दिया है, जिससे औसत छात्र स्वयं को कमतर आंकने लगता है और धीरे-धीरे अवसाद की गिरफ़्त में आ जाता है। यह स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब नौकरी और भविष्य की संभावनाएं भी धुंधली नजर आने लगती हैं। बेरोजगारी का दंश छात्रों के मनोबल को तोड़ता है और कई बार आत्महत्या को ही एकमात्र विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है।
यह तथ्य भी गंभीर है कि सिर्फ कोचिंग संस्थानों में ही नहीं, बल्कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी पिछले एक दशक में 52 छात्रों ने आत्महत्या की है। यह आंकड़ा कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक गहरी और व्यापक समस्या का संकेत है।
इस संकट से उबरने के लिए नीतिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर ठोस कदम उठाने होंगे। राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘कोचिंग संस्थान (नियंत्रण एवं विनियमन) विधेयक’ एक सकारात्मक पहल हो सकती है, लेकिन यह काफी नहीं है। केंद्र सरकार को भी राष्ट्रीय स्तर पर इसी प्रकार की ठोस नीतियां बनानी होंगी, जिससे छात्रों पर बढ़ते दबाव को कम किया जा सके।
इसके अतिरिक्त, कोचिंग संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ऐसा तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जो निराश, हताश और अवसादग्रस्त छात्रों के साथ निरंतर संवाद कर सके और उनमें आशा, आत्मबल तथा आत्मविश्वास का संचार कर सके।
अंततः यह आवश्यक है कि हम शिक्षा को मात्र अंकों और रैंक की दौड़ से मुक्त करें और छात्रों की बहुआयामी प्रतिभाओं को सम्मान दें। साथ ही, रोजगार के नए अवसर सृजित कर यह सुनिश्चित करें कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल नौकरी पाना न होकर समग्र विकास और संतुलित जीवन हो।
शिक्षा का उद्देश्य केवल टॉपर्स पैदा करना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसे नागरिकों का निर्माण करना चाहिए जो संतुलित, आत्मविश्वासी और सशक्त हों।


