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June 17, 2026
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पुलिस डायरीज: सरिता पटेल | “मुझे थाना इंचार्ज बनना था!” | SI सरिता पटेल धाकड़ का संघर्ष और सफलता की कहानी

गाँव की सरिता जिसने ख़ुद को ‘दरोगा’ बनाने का सपना पूरा किया: SI सरिता पटेल धाकड़ की प्रेरणादायक कहानी

निश्चित रूप से, कुछ कहानियाँ केवल प्रेरणा नहीं देतीं, बल्कि समाज की रूढ़ियों को तोड़कर आगे बढ़ने का मार्ग भी दिखाती हैं। सब-इंस्पेक्टर (SI) सरिता पटेल धाकड़, जो वर्तमान में जबलपुर में तैनात हैं, उनकी कहानी इन्हीं प्रेरणादायक गाथाओं में से एक है। एक ग्रामीण पृष्ठभूमि, सीमित संसाधन और विवाह के सामाजिक दबाव के बावजूद, सरिता ने न केवल पुलिस वर्दी पहनी, बल्कि आज वह अपनी पोस्ट को लोक सेवा का सबसे बड़ा मंच मानती हैं।

वर्दी का ‘औरा’ और बचपन का सपना

सरिता पटेल नरसिंहपुर जिले के एक छोटे से गाँव सहावन खैरवा से आती हैं। उनका परिवार खेती-किसानी से जुड़ा रहा और उनके दादाजी सरपंच थे। घर पर राजनीतिक और सामाजिक लोगों का आना-जाना लगा रहता था, लेकिन छोटी सरिता का मन पुलिस की गाड़ी और “दरोगा जी” के ‘औरा’ (प्रभाव) पर अटक गया था। उन्हें याद है कि जब भी पुलिस की गाड़ी गाँव आती थी, तो लोगों के मन में एक अलग ही सम्मान का भाव होता था। बचपन में ही उनके दिल में यह बीज लग गया था कि उन्हें टू-स्टार वाली वर्दी पहननी है, उन्हें थाना इंचार्ज बनना है।

शादी का दबाव और सहयोग की शक्ति

ग्रामीण परिवेश में, खासकर बड़ी बेटी होने के नाते, सरिता को पढ़ाई पूरी करने से पहले ही शादी के दबाव का सामना करना पड़ा। 10वीं कक्षा से ही रिश्ते आने लगे थे। हालांकि, उन्होंने अपने दादाजी के समर्थन से 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने कॉलेज में बी.सी.ए. (BCA) की पढ़ाई होशंगाबाद से शुरू की, लेकिन दूसरे वर्ष में ही उनकी शादी हो गई।

यहाँ उनकी कहानी में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। उनके पति, जो स्वयं सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे थे, उन्होंने न केवल उनकी शिक्षा का समर्थन किया, बल्कि SI परीक्षा की तैयारी में भी पूरा सहयोग दिया। 2013-14 में उन्होंने यह लक्ष्य हासिल किया, यह साबित करते हुए कि यदि जीवनसाथी सहयोगी हो तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।

अपराध का विश्लेषण: अशिक्षा और नशे की भूमिका

एक पुलिस अधिकारी के तौर पर सरिता ने जबलपुर के कई थानों (लाडगंज, पनागर, मझौली, कोतवाली आदि) में काम किया है। अपने अनुभवों के आधार पर वह अपराध की जड़ तक पहुँचती हैं। उनके अनुसार, युवाओं में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा है। जब सही और गलत का विवेक नहीं होता, तो बच्चे आसानी से गलत संगत और नशे की लत में पड़कर अपराध की दुनिया में धकेल दिए जाते हैं।

उन्होंने बर्गी में एक जटिल हत्या के मामले का जिक्र किया, जहाँ व्यापारिक लेन-देन के चलते एक सुनियोजित हत्या को दुर्घटना दिखाने का प्रयास किया गया था। इस मामले की बारीकी से जांच और घटनास्थल पर फोरेंसिक साक्ष्यों के विश्लेषण से ही सच सामने आया। सरिता मानती हैं कि “विधि का विधान है, अपराध छुप नहीं सकता,” और पुलिस का काम इसी सच्चाई को उजागर करना है।

वर्दी से बड़ा ‘परोपकार’ का मंच

सरिता पटेल के लिए दरोगा बनना केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि “मानव जीवन मिला है तो परोपकार करें” के सिद्धांत को जीने का जरिया है। वह अपनी पोस्ट को सेवा करने का सबसे अच्छा प्लेटफॉर्म मानती हैं, जहाँ वह सीधे नागरिकों की समस्याओं का समाधान करती हैं। वह केवल अपराधियों को नहीं पकड़तीं, बल्कि निवारक उपाय भी करती हैं। वह अक्सर स्कूलों में जाती हैं, बच्चों के साथ समय बिताती हैं, उनके साथ खेलती हैं और उन्हें सही मार्ग दिखाती हैं। वह मानती हैं कि अगर बच्चों की समस्या को उनके बाल मन से समझ लिया जाए, तो भविष्य के अपराधों को रोका जा सकता है।

युवाओं, खासकर लड़कियों के लिए संदेश

सरिता पटेल धाकड़ का सबसे स्पष्ट और शक्तिशाली संदेश देश की युवा लड़कियों के लिए है: अपना एक लक्ष्य निर्धारित करें, शिक्षा प्राप्त करें और अपने पैरों पर खड़ा हों। उनका मानना है कि आत्मनिर्भरता (अर्निंग) बहुत जरूरी है ताकि आप किसी पर निर्भर न हों। वह कहती हैं, “चाहे सिलाई, बुनाई, कढ़ाई, पेंटिंग हो या खाना बनाना—हर क्षेत्र में आप अच्छा काम करके आत्मनिर्भर बन सकती हैं।”

सरिता पटेल धाकड़ की मुस्कुराहट यह सिखाती है कि जीवन में कितनी भी चुनौतियाँ क्यों न हों, यदि आप खुद के लिए समय निकालते हैं और अपने लक्ष्यों के प्रति समर्पित रहते हैं, तो सफलता और संतोष निश्चित है। उनकी कहानी देश की उन लाखों लड़कियों के लिए एक उज्जवल उदाहरण है जो ग्रामीण या सामाजिक बंधनों के कारण अपने सपनों को पूरा करने से हिचकती हैं।

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