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October 27, 2026
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पुलिस डायरीज: सोनू कुर्मी | जुबां पर ‘बुंदेली मिठास’, इरादों में ‘फौलाद’, गाँव की पगडंडियों से शहर की पुलिसिंग तक: देसी अंदाज, कड़क मिजाज

सफलता संसाधनों की नहीं, बल्कि संकल्प की मोहताज होती है। यह बात चरितार्थ होती है जबलपुर के ओमती नगर पुलिस अधीक्षक (CSP) सोनू कुर्मी के जीवन पर। सी टाइम्स के ‘पुलिस डायरीज’ कार्यक्रम में अपनी यात्रा साझा करते हुए उन्होंने न केवल अपने संघर्षों को बयां किया, बल्कि प्रदेश के युवाओं को एक नई दिशा भी दिखाई। सागर जिले के गिदवानी जैसे छोटे से गांव से निकलकर पुलिस सेवा में अपनी धाक जमाने वाले सोनू कुर्मी की कहानी ग्रामीण भारत के सामर्थ्य का प्रतीक है।

शिक्षा और संघर्ष का दौर
सोनू कुर्मी का बचपन बुंदेलखंड की सौंधी मिट्टी में बीता। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही स्कूल में हुई। संसाधनों का अभाव था, लेकिन जिज्ञासा की कमी नहीं थी। वे बताते हैं कि पत्रिकाओं में टॉपर्स के इंटरव्यू पढ़कर उनके मन में प्रशासनिक सेवा में जाने का बीज अंकुरित हुआ। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से बी.फार्मा करने के बाद उन्होंने लक्ष्य निर्धारित किया और 2018 में पुलिस सेवा में चयनित हुए। यह साबित करता है कि यदि दृष्टि स्पष्ट हो, तो पृष्ठभूमि मायने नहीं रखती।

बालाघाट का अनुभव: बंदूक से कलम की ओर
अपने करियर के दौरान उन्होंने रीवा, इंदौर एसटीएफ और बालाघाट जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में सेवाएं दीं। बालाघाट, जिसे अक्सर नक्सलवाद के लिए जाना जाता था, वहां के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने एक सुखद तस्वीर पेश की। उनका कहना है कि अब वहां के युवा मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं। शासन की योजनाओं, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच ने नक्सलवाद की कमर तोड़ दी है। वहां का युवा अब हथियार नहीं, बल्कि कलम थाम रहा है और सरकारी नौकरियों की ओर देख रहा है।
नशे के खिलाफ जंग और पुलिसिंग

नशे के खिलाफ जंग और पुलिसिंग
वर्तमान में जबलपुर के ओमती क्षेत्र में पदस्थ सीएसपी कुर्मी के सामने नई चुनौतियां हैं। बेलबाग जैसे क्षेत्रों में नशे के कारोबार पर लगाम लगाना उनकी प्राथमिकता रही है। ‘नशे से दूरी है जरूरी’ जैसी मुहिम और सख्त पुलिसिंग के जरिए उन्होंने इस क्षेत्र की छवि बदलने का प्रयास किया है। उनका मानना है कि पुलिसिंग सिर्फ अपराध रोकना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाना भी है।

युवाओं के लिए संदेश
आज के युवाओं के लिए उनका संदेश बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक है। वे कहते हैं कि आज हम अवसरों के युग में जी रहे हैं। सफलता के मायने अब सिर्फ डॉक्टर या इंजीनियर बनने तक सीमित नहीं हैं। यूट्यूबर बनने से लेकर स्पोर्ट्स और आर्ट्स तक—विकल्पों की कमी नहीं है। स्वामी विवेकानंद के विचारों को उद्धृत करते हुए उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपना एक लक्ष्य तय करें और अपनी ऊर्जा उसी में खपा दें, क्योंकि जवानी का यह समय दोबारा लौटकर नहीं आएगा।

सोनू कुर्मी का सफर एक अधिकारी की सफलता की कहानी भर नहीं है, बल्कि यह उस बदलते भारत की तस्वीर है जहां गांव का एक लड़का अपनी मेहनत से व्यवस्था का हिस्सा बनता है और समाज को बदलने का माद्दा रखता है।

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