रादुविवि में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय विज्ञान कार्यशाला काशुभारंभ
जबलपुर। भारत की ज्ञान और विज्ञान परंपरा का वैश्विक प्रभाव भी गहरा रहा है। कई प्राचीन भारतीय विचार और सिद्धांत, पश्चिमी विज्ञान और दर्शन पर भी प्रभाव डाल चुके हैं। भारतीय परंपरा और विज्ञान गहराई से जुड़े हैं, जहां प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणाली अवलोकन, प्रयोग और अनुसंधान पर आधारित थी। वेदों, उपनिषदों, आयुर्वेद और योग के माध्यम से गणित (शून्य, दशमलव), खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान (स्टील), और चिकित्सा के क्षेत्र में भारत ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित किया। आधुनिक युग में भी योग और आयुर्वेद की उपयोगिता सिद्ध हो रही है। आशा है कि यह तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय विज्ञान कार्यशाला युवाओं और शिक्षाविदों को काफी नई जानकारियों से अवगत होने में सहायक सिद्ध होगी। ये बात माननीय कुलगुरु प्रो. राजेश कुमार वर्मा ने विश्वविद्यालय के पं. कुंजीलाल दुबे प्रेक्षागृह में आयोजित कार्यशाला उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कही।
मध्यप्रदेश शासन तथा पीएम ऊषा परियोजना के सहयोग से क्रिस्प भोपाल के प्रबंधन में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के भौतिकी विज्ञान, जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और गणित आदि विभागों के संयुक्त तत्वावधान में ‘सतत भविष्य के लिए विज्ञानः शुद्ध और अनुप्रयुक्त अनुसंधान के संगम पर नवाचार‘ विषय पर 26 से 28 फरवरी 2026 तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के उद्घाटन कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में डॉ. रंजना गंगराड़े, डिविजनल हेड-साइंटिफिक ऑफिसर इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च, गांधीनगर, गुजरात ने बताया कि फ्रांस के कई प्रमुख और नए वैज्ञानिक प्रयोगों व शोध परियोजनाओं में भारत की महत्वपूर्ण मदद और भागीदारी शामिल है। ये सहयोग मुख्य रूप से परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), स्वास्थ्य और गहरे समुद्र के क्षेत्रों में चल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय विज्ञान कार्यशाला संयोजक प्रो. राकेश बाजपेयी ने बताया कि इस कार्यशाला में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक शामिल हो रहे हैं। उद्घाटन सत्र में प्रभारी कुलसचिव प्रो. सुरेन्द्र सिंह, प्रो. एस.एस. संधू, प्रो. पी.के. खरे, प्रो. जे.के. मैत्रा मंचासीन रहे। संचालन डॉ. दिव्या सिंह ने किया ।
तकनीकी सत्रों में हुए वैचारिक मंथन
कार्यशाला के प्रथम दिवस पहला सत्र (बातचीत और संवाद सहित) का आयोजन सत्र अध्यक्ष-प्रो. एस.एस. संधू, डीन, जीवन विज्ञान संकाय की मौजूदगी में हुआ। इसमें मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. रंजना ने फ्रांस के वैज्ञानिक प्रयोगों में भारतीय मदद के मुख्य उदाहरण ‘आईटीईआर‘ कृत्रिम सूर्य प्रोजेक्ट और दुनिया के सबसे बड़े परमाणु संलयन प्रयोग पर जानकारी प्रदान की। इसके पश्चात श्री पी.एस. तिवारी, संस्थापक निदेशक एवं सीईओ, टेकवन इनोवेशन ओपीसी प्राइवेट लिमिटेड, हैदराबाद, तेलंगाना एवं प्रो. संजीव कुमार दत्ता, गणित विभाग, कल्याणी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल ने अपने विचारों को प्रस्तुत किया। इसके बाद के सत्र में विषय विशेषज्ञ के रूप में प्रो. अरुण कुमार, सेवानिवृत्त आचार्य, गणित विभाग एवं डॉ. विजयकुमार मुनि, गणित विभाग, शिवमोग्गा, कर्नाटक, प्रो. के.के. वर्मा, प्रो. सुरेंद्र सिंह ने ऑफ लाईन तो डॉ. केतन सी. कुपरकर, रसायन विज्ञान विभाग, वीएनआईटी, सूरत, गुजरात ने ऑनलाइन अपनी बातें रखीं। इस अवसर पर आयोजन समिति के प्रो. मृदुला दुबे, डॉ. राजेंद्र कुमार दुबे, डॉ. रिंकेश भट्ट, डॉ. पल्लवी शुक्ला, डॉ. रेणु पाठक, डॉ. दिव्या सिंह, डॉ. ज्योति चौबे, डॉ. रानू चतुर्वेदी, डॉ. प्रदीप कुमार विश्वकर्मा, डॉ. दीपक कुमार रजक, डॉ. गरिमा प्रवीण पांडे, डॉ. मोहम्मद वाशिद खान, डॉ. धीरेंद्र मौर्य, डॉ. चंदन सिंह अहिरवार, डॉ. अभिषेक पाण्डेय, राहुल नायक, इमरान मंसूरी, डॉ. प्रतिभा जयसिंह, क्रिस्प भोपाल के अविनाश जैन एवं अनय कुमार चौबे का सक्रिय सहयोग रहा।


