जबलपुर। पीक सीजन शुरू होने से पहले ही ट्रेनों में भारी भीड़ देखने को मिल रही है। हालात ऐसे हैं कि स्लीपर और एसी कोच भी जनरल बोगियों की तरह खचाखच भरे नजर आ रहे हैं। इससे पहले ऐसा दृश्य वर्ष 2020 में कोविड-19 के दौरान श्रमिक ट्रेनों में देखने को मिला था, जब यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए रेलवे स्टेशनों के बाहर कई दिनों तक इंतजार करना पड़ा था।
इस समय मुम्बई, गुजरात और तमिलनाडु से चलकर जबलपुर होते हुए कटनी, सतना, मानिकपुर के रास्ते बिहार और उत्तर प्रदेश जाने वाली ट्रेनों में यात्रियों की भारी भीड़ उमड़ रही है। स्थिति इतनी गंभीर है कि टिकट होने के बावजूद यात्रियों को अपनी सीट तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। स्लीपर और वातानुकूलित डिब्बों में भीड़ इस कदर है कि वे जनरल कोच जैसे दिखाई देने लगे हैं।
रेलवे सूत्रों के अनुसार, बिना उचित टिकट के एसी कोच में सफर करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ गई है। टीटीई स्क्वॉड को एक ही कोच में 35 हजार से 40 हजार रुपये तक का जुर्माना वसूलना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि एक कोच में ही कार्रवाई करते-करते समय निकल जाता है और अन्य कोचों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
यात्रियों की इस अचानक बढ़ी भीड़ के पीछे एक बड़ी वजह गैस सिलेंडर की किल्लत बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश और बिहार से मजदूरी करने के लिए मुम्बई, गुजरात, तमिलनाडु और बेंगलुरु जैसे शहरों में गए मजदूर वर्ग को गैस की कमी के कारण भोजन की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में वे मजबूर होकर अपने घरों की ओर लौट रहे हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सामान्य तौर पर रेलवे में गर्मी का पीक सीजन 1 मई से 10 जून के बीच लगभग 40 दिनों तक रहता है। इसके बाद 20 जून से 10 जुलाई के बीच अप दिशा की ट्रेनों में भीड़ बढ़ती है, जब स्कूल खुलने लगते हैं। लेकिन इस बार स्थिति अलग है—अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, विशेष रूप से ईरान–इराक के बीच तनाव के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर आम मजदूर वर्ग पर पड़ा है।
इसी कारण बड़ी संख्या में मजदूर अपने कार्यस्थलों से वापस घर लौट रहे हैं, जिससे डाउन ट्रेनों में अचानक भीड़ बढ़ गई है। रेलवे के सामने इस अप्रत्याशित स्थिति से निपटना एक बड़ी चुनौती बन गया है।


