अनूपपुर। ज़िले में पशु तस्करी का नेटवर्क अब किसी छुपे खेल की तरह नहीं, बल्कि खुलेआम प्रशासन को चुनौती देता नज़र आ रहा है। ताज़ा और पुख़्ता सूचनाओं के अनुसार, जैतहरी थाना क्षेत्र का ‘लपटा इलाका’ और मुंडा पशु तस्करों का नया और सबसे सुरक्षित कॉरिडोर बन चुका है, जहाँ से होकर “मौत के ट्रक” बेरोकटोक गुजरने की तैयारी में हैं। और गुजर भी रहे है। न तो कानून का डर न प्रशासन का खौफ।
हैरानी की बात यह है कि एक दिन पहले ही सटीक सूचना देने के बावजूद प्रशासन की कार्रवाई ‘निल’ रही, और अब भी हालात जस के तस बने हुए हैं। शिवसेना और बजरंग दल लगातार थाना जैतहरी और प्रशासन को अवगत करा रहे। पर कार्यवाही शून्य जब सैया भय कोतवाल तो डर कहे का।
सूत्रों के मुताबिक जिन वाहनों के जरिए पशुओं की अवैध ढुलाई प्रस्तावित है, उनके नंबर और रूट पहले ही चिन्हित किए जा चुके हैं
तस्करी रूट:
लपटा (जैतहरी) से सोहागपुर से बुढार से जैतपुर से गोहपारू से व्यौहारी से सीधी यह वही रूट है, जिस पर पहले भी कई बार अवैध गतिविधियों की शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन ठोस कार्रवाई के अभाव में यह अब तस्करों का स्थायी गलियारा बनता जा रहा है।
*लपटा बना तस्करों का ‘सुरक्षित किला’!*
सबसे बड़ा सवाल यह है कि मोहित, साजिद, कल्लू बाबा और वसीम जैसे नामचीन तस्कर जैतहरी के लपटा क्षेत्र में इतने बेखौफ कैसे हैं? क्या जैतहरी पुलिस को इन ट्रकों की आवाजाही की जानकारी नहीं?
या फिर जानकारी होते हुए भी जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं?
क्या यह क्षेत्र पशु तस्करी के लिए अनौपचारिक “सेफ ज़ोन” घोषित कर दिया गया है?
स्थानीय सूत्र बताते हैं कि लपटा क्षेत्र में तस्करों की मूवमेंट कोई नई बात नहीं है, फिर भी न तो नाकेबंदी दिखती है, न गश्त, और न ही कोई ठोस निगरानी व्यवस्था।
*प्रशासन के लिए खुली चेतावनी, पुलिस की साख दांव पर*
एक सजग नागरिक के नाते सटीक लोकेशन, ट्रक नंबर और पूरा रूट सार्वजनिक किया जा चुका है। इसके बाद भी यदि ये ट्रक लपटा क्षेत्र से सुरक्षित निकल जाते हैं, तो यह मानना गलत नहीं होगा कि जैतहरी पुलिस और शहडोल संभाग का पहरा सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित है।
यह सिर्फ़ पशु तस्करी का मामला नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था, मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक ईमानदारी की अग्निपरीक्षा है।
*अब सवाल यह नहीं कि सूचना थी या नहीं, सवाल यह है कि कार्रवाई क्यों नहीं?*
अगर आज भी इन ट्रकों को नहीं रोका गया, तो कल यह सवाल ज़िले से निकलकर संभाग और राज्य स्तर तक गूंजेगा,किसके संरक्षण में चल रहा है यह सिंडिकेट?
किन अधिकारियों की चुप्पी ने तस्करों को इतना साहस दिया?
और आख़िर कब तक पशु तस्करी पर प्रशासनिक “मौन सहमति” चलती रहेगी?
*कलम ने अपना फ़र्ज़ निभा दिया…*
“कलम ने अपना काम कर दिया है, अब पुलिस अपनी वर्दी की लाज बचाए।”
अब देखना यह है कि जैतहरी पुलिस और शहडोल संभाग का प्रशासन इतिहास में किस रूप में दर्ज होता है,कर्तव्यनिष्ठ प्रहरी के रूप में, या मौन दर्शक के तौर पर।


