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April 29, 2026
सी टाइम्स
अंतरराष्ट्रीय

यूएई ने ओपेक छोड़ने का ऐलान किया, तेल सप्लाई नीति में बड़ा बदलाव



न्यूयॉर्क, 28 अप्रैल ( भारत को तेल सप्लाई करने वाले बड़े देशों में से एक संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने मंगलवार को घोषणा की कि वह ऑर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) छोड़ रहा है। यह फैसला ईरान युद्ध के बाद के हालात के बीच लिया गया है। ओपेक एक ऐसा समूह है जो लंबे समय से दुनिया में तेल की कीमतों पर असर डालता रहा है।



यूएई ने यह घोषणा अपनी सरकारी न्यूज एजेंसी डब्‍ल्‍यूएएम के जरिए की। उसने कहा कि यह फैसला उसके लंबे समय के आर्थिक और रणनीतिक प्लान के हिसाब से लिया गया है। यह उसके बदलते हुए ऊर्जा सेक्टर को दिखाता है।

डब्‍ल्‍यूएएम के मुताबिक, यूएई का ओपेक से बाहर निकलना शुक्रवार से लागू हो जाएगा। इसके बाद भी यूएई जिम्मेदारी से काम करता रहेगा और जरूरत के हिसाब से तेल की सप्लाई बढ़ाएगा।

एजेंसी ने यह भी कहा कि यूएई दुनिया के सबसे सस्ते और कम कार्बन वाले तेल उत्पादकों में से एक है, जो आने वाले समय में वैश्विक विकास और प्रदूषण कम करने में मदद करेगा।

पिछले साल यूएई भारत को तेल सप्लाई करने वाले देशों में चौथे या पांचवें नंबर पर था। 2024 में यह व्यापार करीब 13.5 बिलियन डॉलर का रहा, ऐसा संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों में बताया गया है।

ओपेक के 12 सदस्यों में यूएई पेट्रोलियम उत्पादों का पांचवां सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन दुनिया में इसकी रैंक आठवीं है, ऐसा अमेरिका की एनर्जी इंफॉर्मेशन एजेंसी के अनुसार है।

यूएई का यह कदम उसकी उस कोशिश का हिस्सा है जिसमें वह अपनी अर्थव्यवस्था को सिर्फ तेल पर निर्भर नहीं रखना चाहता। डब्‍ल्‍यूएएम ने बताया कि “ऑपरेशन 300बीएन” जैसे प्रोग्राम के जरिए वह मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने, एक्सपोर्ट बढ़ाने और विदेशी निवेश लाने पर काम कर रहा है।

ओपेक की स्थापना 1967 में हुई थी और 1973 में इजरायल युद्ध के दौरान इसने अपनी ताकत दिखाई थी, जब अरब देशों ने तेल की सप्लाई कम कर दी थी और दुनिया भर में कीमतें बढ़ गई थीं।

ओपेक अपने सदस्यों के लिए एक्सपोर्ट कोटा तय करता है, लेकिन अब यूएई इन नियमों से आजाद हो जाएगा। वह ईरान युद्ध के बाद अपनी ऊर्जा उत्पादन क्षमता और एक्सपोर्ट को फिर से मजबूत करना चाहता है।

हालांकि, अब ओपेक की ताकत पहले जैसी नहीं रही है। अमेरिका, रूस और कनाडा जैसे देश बड़े तेल उत्पादक बन चुके हैं और उन्होंने इस क्षेत्र में ओपेक को काफी पीछे छोड़ दिया है। फिर भी ओपेक आज भी अपने कोटा सिस्टम के जरिए दुनिया में तेल की कीमतों पर काफी असर डालता है।

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