33.5 C
Jabalpur
June 9, 2026
सी टाइम्स
राष्ट्रीय

धरती आबा बिरसा मुंडा: जब तीर-कमान ने दी चुनौती, जंगलों से उठी वह क्रांति जिसने हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत की नींव 

नई दिल्ली, 8 जून । यह कहानी है उस योद्धा की, जिसने जंगल से उठकर ब्रिटिश तानाशाही को खुली चुनौती दी और कह दिया कि अब राज तुम्हारा नहीं बल्कि आदिवासियों का है। उस नायक ने बता दिया था कि जब जंगल जागता है तो साम्राज्य कांपते हैं। एक ऐसा योद्धा जिसने न बंदूक से लड़ाई लड़ी और न किताबों से क्रांति लिखी, बस अपने हौसलों से ही ‘उलगुलान’ कर डाला। बात हो रही है महज 25 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह देने वाले महान क्रांतिकारी बिरसा मुंडा की।बिरसा मुंडा को ‘धरती आबा’ यानी धरती का पिता कहा जाता है और देश के एक बड़े वर्ग में उन्हें ये पहचान दी। उन्हें भगवान का दर्जा दिया गया। आदिवासी बाहुल्य राज्यों में आज भी उनकी पूजा की जाती है।15 नवंबर 1875 को झारखंड के खूंटी जिले के उलिहातु गांव में जन्मे बिरसा मुंडा का बचपन सगे संबंधियों के यहां भेड़-बकरियां चराते और बांसुरी बजाते बीता था। उस समय भारत के उरांव, मुंडा और खड़िया आदिवासी विदेशी दास्तां की जंजीरों में जकड़े हुए थे।

ऐसे हालात सिर्फ बिरसा मुंडा के घर के नहीं बल्कि हर आदिवासी के यहां थे। वे सदियों से जमीन, फसलों और अपने गांवों के मालिक आप थे लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें नष्ट करने के लिए जमींदार, जागीरदार, जज, कचहरी, जंगल के ठेकेदार और दलाल उनके ऊपर लाद दिए थे। वनवासी अपनी ही जमीन पर मालिक से नौकर बन चुका था। लोग बेबसी, भूख, अंधविश्वासों और दमन के कारण डरी-सहमी जिंदगी जी रहे थे।उस कालखंड में एक बार बिरसा मुंडा कुछ दिनों के लिए चाईबासा के जर्मन स्कूल में पढ़ने गए लेकिन मुसीबतों ने कभी पीछा नहीं छोड़ा। उनकी जिंदगी का ये एक अहम हिस्सा है कि उस स्कूल में आदिवासी-वनवासी संस्कृति का मजाक उड़ाया जाता था, जो बिरसा मुंडा को कतई बर्दाश्त नहीं था। एक दिन उन्होंने इसके खिलाफ विरोध शुरू कर दिया लेकिन दूसरे धर्म के प्रचारकों ने उन्हें स्कूल से निकाल दिया।इसी समय उनकी मुलाकात स्वामी आनंद पांडे से हुई, जो नजदीक के गांव में एक जमींदार के मुंशी थे। उनसे मिलने के बाद बिरसा मुंडा को अपनी संस्कृति, धर्म और महाभारत के पात्रों का परिचय हुआ। इस तरह आनंद पांडे की संगति में उन्होंने बहुत कुछ सीखा और समझा। वे गहन अध्ययन करते गए और इस अध्ययन के साथ-साथ स्वतंत्रता के लिए युद्ध करने से पहले आदिवासी समाज में वैचारिक जागृति पैदा करने पर विचार किया।

बिरसा ने भारतीय धर्मग्रंथों और दर्शन, अध्ययन के अलावा आयुर्वेदिक ज्ञान भी हासिल कर लिया था। वे दिन रात वनों में घूमकर जड़ी-बूटियां इकट्ठी करते, उनकी औषधियों को लेकर खोज करते और जरूरत पड़ने पर प्रयोग भी करते थे। कहते हैं कि बिरसा मुंडा ने आश्चर्यजनिक बुद्धि कौशल और मेहनत से औषधि विज्ञान में प्रगति की। वे बड़ी से बड़ी और पुरानी बीमारियों का इलाज करने की क्षमता प्राप्त कर चुके थे।यह कहा जाता है कि 1895 में कुछ ऐसी अलौकिक घटनाएं घटीं, जिनके कारण लोग बिरसा मुंडा को भगवान का अवतार मानते लगे। बिरसा ने शोषित और पीड़ित आदिवासियों में ज्ञान और शक्ति की ज्योति जगाई।

देश की आजादी के लिए घने जंगलों और बीहड़ों में आंदोलन चलाने वाले लोगों में बिरसा मुंडा अग्रणी रहे। आपसी फूट, गरीबी और जन संगठन का अभाव लोगों में था। इन हालातों को देखते हुए बिरसा मुंडा ने उरांव, मुंडा और खड़िया आदिवासियों के मुखियाओं से मिलने का सिलसिला शुरू किया था।वनवासियों के बीच अंग्रेजों के विरोध में सशस्त्र क्रांति की अलख जगाने के लिए बिरसा मुंडा ने बहुत बड़ा अभियान छेड़ा था। उन्होंने अपने साहस और संघर्ष से ब्रिटिश शासन को चुनौती दी और संघर्ष शुरू किया, जिसे ‘उलगुलान’ कहा जाता है। अंग्रेजी षड्यंत्रों को भलीभांति समझने वाले बिरसा मुंडा ने धार्मिक और राजनैतिक स्तर पर काम शुरू किया था।

1898 में डोंबारी बुरु की पहाड़ियों पर एक विशाल सभा हुई। यहां ब्रिटिश पुलिस ने बिरसा मुंडा को गिरफ्तार करने का प्रयास किया, लेकिन गांव वालों की मदद से वह बच निकले। इसके बाद बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपने आंदोलन को रुकने नहीं दिया। फिर 24 दिसंबर 1899 को एक आंदोलन शुरू हुआ। तीरों से पुलिस थानों पर आक्रमण करके उनमें आग लगा दी गई। सेना से भी सीधी मुठभेड़ हुई, लेकिन तीर कमान गोलियों का सामना नहीं कर पाए।9 जनवरी, 1900 को भगवान बिरसा मुंडा के नेतृत्व में डोंबारी बुरु पहाड़ी पर एकत्रित हजारों आदिवासियों पर ब्रिटिश सैनिकों ने अंधाधुंध गोलीबारी की। इस हिंसक कार्रवाई में सैकड़ों लोग शहीद हुए, जिसके कारण इतिहास में यह घटना झारखंड का जलियांवाला बाग के नाम से दर्ज हुई।

यह घटना तब हुई जब बिरसा मुंडा और उनके अनुयायी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की रणनीति बना रहे थे। ब्रिटिश सेना ने इस सभा की सूचना पाकर पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया और अचानक हमला बोल दिया। इस भीषण गोलीकांड के दौरान बिरसा मुंडा और उनके साथियों ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया। आखिर में, बिरसा मुंडा उस घेराव से किसी तरह बच निकलने में सफल रहे। हालांकि बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 9 जून 1900 को जेल में उनकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि उन्हें जेल में विष दे दिया गया था।

अन्य ख़बरें

पश्चिम बंगाल में आयुष्मान भारत योजना लागू, देशभर में हुआ पीएम-जेएवाई का पूर्ण विस्तार

Newsdesk

भारतीय दूतावास ने एमटी मैरीवेक्स पर सवार 24 भारतीय क्रू सदस्यों के रेस्क्यू के लिए ओमान का किया धन्यवाद

Newsdesk

संविधान को जीवन में अपनाने से ही बनेगा विकसित भारत: सीएम नायब सिंह सैनी

Newsdesk

Leave a Reply

Discover more from सी टाइम्स

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading